हिन्दी का ब्रह्मभोज

राष्ट्र की भाषा, राज-काज की भाषा, जन-जन की भाषा, वह भाषा, जो सैंकड़ों देशों में बोली जाती है। वह भाषा, जो सहृदय है और देशज, आंचलिक सभी बोलियों को अपने हृदय में समोये हुए है। वही भाषा हिन्दी आज अपने ही देश में वधिवा -विलाप कर रही है। साल में 1 दिन या एक सप्ताह पुण्य तिथि मनाते हैं और ब्रह्म भोज की तरह हिन्दी दिवस या हिन्दी सप्ताह मनाते हैं। हिन्दी उस गरीब की तरह है, जो बड़ों और सम्मानित लोंगों की जमात में जाने में डरती है, घबराती है, शरमाती है। आज न्यायालय से लेकर सचिवालय तक हिन्दी कहाँ हैं? इसी तरह देखिए कि देश के बड़े संस्थान जिसमें रेलवे, डाक विभाग, दूस संचार विभाग, एवं बड़ी-बड़ी सार्वजनिक क्षेत्रों की कंपनियाँ, जहाँ रश्मआदयगी के लिए हिन्दी विभाग खोल रखा है, लेकिन हिन्दी में उनका काम न के बराबर होता है। और निजी क्षेत्रों की कंपनियाँ! उनकी जिम्मेवारी नहीं होती कि वे राष्ट्रीय अस्मिता को बचाने में साथ दें। सिर्फ सरकारी जिम्मेवारी से हिन्दी को प्रतिष्ठा दिलवाने की उमीद करना बेमानी होगी। यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि हमारे देश और कई राज्य के मुखिया, कई बार अहिन्दी भाषी क्षेत्रों के होते हैं, लेकिन सैद्धांतिक तौर पर हिन्दी दिवस पर उनका संदेश होता है, जनता के नाम हिन्दी को अपनाने के लिए। यह गर्व की बात है या शर्म की बात कौन बतलाएगा?चैनलों पर देखिए हिन्दी के खानेवाले हिन्दी बोलने में शरमाते हैं। उनका मानना है कि अंग्रेजी सभ्य होने की पहचान कराता है।हर साल 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस या सप्ताह मनाया जाता है। यह आम जनता नहीं मनाती। आम लोग इसमें सहभागी नहीं होते। हिन्दी दिवस गिने-चुने उन विभागों में मनाये जाते हैं, जिस के भवन के दीवारों पर हिन्दी के प्रति महापुरुषों के अनमोल वचन लिख कर शीशे में मढ़कर टांगे गये होते हैं, पर आम दिनचर्या में उनके सारे कार्य अंग्रेजी में होते हैं। इन विभागों में हिन्दी दिवस के नाम पर कुछ पुरस्कार बाँटे जाते हैं और इस खुशी के मौके पर राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर के मिला-जुला काव्य गोष्ठी का आयोजन त्हिन्दी का ब्रह्मभोज किया जाता है। इस आयोजन में कोई अपने घर का पैसा थोड़े ही लगने वाला, जनता के पैसे हैं। इन दिनों हिन्दी में बोलने, लिखने, काम करने की कसमें खायी जाती है। ठीक उसी तरह, जिस तरह, न्यायालय में गीता की कसम खाकर झूठ बोलने का सिलसिला शुरू होता है।आचार-विचार और व्यवहार किसी के जबरन थोपने से नहीं बदलता, इसके लिए मानसिक स्तर पर तैयार होना पड़ता है या तैयार कराना पड़ता है। महात्मा गांधी के उस (सिद्ध्यांत )का पालन करना पड़ता है, जिसमें उन्होंने कहा था कि दूसरों से कोई काम कराने से पहले स्वयं उसे करो।

पक्ष और विपक्ष में तमाम बातें हैं, पर यह सच है कि शायद ही विश्व के किसी भी देश में राष्ट्रभाषा के लिए इतना आयोजन या सम्मान होता हो।

अरुण कुमार झा

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8 टिप्पणियाँ

  1. अविनाश वाचस्पति said,

    सितम्बर 21, 2009 at 7:09 पूर्वाह्न

    मैं आपकी बात में एक बात जोड़ना चाहता हूं कि दिल से हिन्‍दी को चाहने वालों की संख्‍या का अनुमान लगाना संभवत: आसमान के सितारों की गिनती करना है। जिनके दिल में हिन्‍दी का सूरज आलोकित हो रहा है वे सभी तो हिन्‍दी रूपी प्रकाश बिखेर ही रहे हैं और निर्बाध रूप से बिखेर रहे हैं। हिन्‍दी की यह आभा निश्चित ही विश्‍व को चमत्‍कृत करने ही वाली है। वो दिन दूर नहीं है। आपने अच्‍छे प्रश्‍न उठाए हैं, जिनका निराकरण किया जाना चाहिए। इस दशा बतलाते हुए दिशासूचक लेख के लिए बधाई स्‍वीकारें।

  2. jayram " viplav " said,

    सितम्बर 22, 2009 at 7:01 पूर्वाह्न

    ब्लॉग -जगत से लेकर जनसत्ता के सम्पादकीय पृष्ठ पर भारत के माथे की बिंदी हिंदी की दुर्दशा का बयान किया गया . अचानक से सितम्बर जो कि खुद अंग्रेजी का महीना है , के इस पखवाड़े में हर तरफ लोग हिंदी के भविष्य को लेकर चिंतित हैं. सभी सरकारी उपक्रमों के दफ्तरों के आगे बड़े-बड़े बैनर लगे पड़े हैं .विभिन्न संस्थाओं द्वारा आयोजित तरह -तरह की शोकसभाओं में प्रखर वक्ताओं ने जाने क्या -क्या कहा होगा ! ज्यादा कुछ नहीं कहूँगा . कई बड़े -बड़े हिंदी हितैषी लोग काफी कुछ लिख चुके हैं . लेकिन एक सवाल कि क्या किसी भी काम को करने का कोई खास दिन होता है ? कितने सजग हैं हम ! हिंदी की चिंता साल में एक दिन करते आये हैं, विश्व हिंदी सम्मलेन में कुछ चाटुकारों को विदेश यात्रा करवाते रहे हैं , करोडों रूपये हिंदी इस्तेमाल के लिए अपील करने वाले विज्ञापन पर खर्च करते आये हैं और इन सब का नतीजा हमारे ही अनुसार सिफर है !
    हिंदी को सर्वप्रचलित करने के ये तमाम प्रक्रम एक दिवस रूप में सिमटे हुए दम घोट रहे हैं . हिंदी खुद को एक दिन की भाषणबाजी में निपटाते देख कर आंसू बहा रही है . तो क्या आप सुधीजनों के पास इन आंसुओं का है कोई जबाव ?

  3. Girish Pankaj said,

    सितम्बर 22, 2009 at 5:21 अपराह्न

    प्रिय अरुण भाई, दृष्टिपात पर मैंने दृष्टिपात किया और पाया कि आपने बेहद श्रम किया है. आपकी मेहनत रंग लाये, और वह रंग ला कर रहेगी. जहा सद्भावना है, वहा सफलता ही सफलता है. मेरी कविता को अपनी पत्रिका के प्रथम पृष्ट पर दे कर आपने जो उदारता दिखाई है, वह समकालीन समय में दुर्लभ होती जा रही है. पत्रिका सुन्दर दीख रही है. इस अंक की प्रतीक्षा रहेगी. मेरा पता है- जी-३१, नया पंचशील नगर, रायपुर-४९२००१ (छत्तीसगढ़)

  4. M.A.Sharma "सेहर" said,

    सितम्बर 22, 2009 at 5:30 अपराह्न

    अरुण जी
    आपने अपनी बात बखूबी रखी है..

    ये इस देश का दुर्भाग्य है की अपनी ही भाषा का सम्मान नहीं कर पा रहे …
    आपको इस लेख के लिए बहुत बधाई !!

  5. Arun Kumar Jha said,

    सितम्बर 22, 2009 at 7:50 अपराह्न

    सभी श्रद़धेय एंव स्‍नेही मिञों का आभार, आप की शक्ति से ही पञिका को जीवन मिलता है, आप की सद्भावना है कि पञिका को जनोपयोगी बना पाता हूं, आप का प्‍यारा सहयोग, हमेशा मिलता र‍हेगा, मैं ऐसा मानता हूं,
    अरूण कुमार झा

  6. naveentyagi said,

    सितम्बर 24, 2009 at 9:28 पूर्वाह्न

    arun ji aajadi ke baad nehroo ne jitna dhyan angreji ki or diya agar usse aadhaa bhi hindi ke vikaas ko deta to aaj bharat ki sthiti vishv me kuch or hi hoti.kyo ki jo vikash hum apni bhaasha me kar sakte the,angreji ki vajah se uska aadha bhi nahi kar paye.

  7. पंकज कुमार झा. said,

    सितम्बर 24, 2009 at 12:16 अपराह्न

    बहुत भावुक एवं चिंतनीय आलेख. वास्तव में इस भाषा की गुलामी ने हमें कही का नहीं छोडा है. ब्रह्मभोज ही विशेषण हो सकता है ऐसे आयोजनों का. वास्तव में सभ्यता और संस्कृति का श्राद्ध ही कर डाला है इन मैकाले पुत्रों ने.

  8. शोभना चौरे said,

    सितम्बर 25, 2009 at 6:29 पूर्वाह्न

    आपका आलेख बहुत ही सारगर्भित है |मै अविनाशजी की बात से सहमत हूँ |हिदी में बहुत काम हो रहा है हिन्दी दिवस मनाने की बजाय हम साल भर (हमेशा ही )हिन्दी की उपलब्धियों की चर्चा करे और हिन्दी को और सम्रद्ध बनाने में सहयोग दे |
    आभार


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