स्मृति गीत-

पितृव्य हमारे

नहीं रहे….

आचार्य संजीव ‘सलिल’

*

वे

आसमान की

छाया थे.

वे

बरगद सी

दृढ़ काया थे.

थे-

पूर्वजन्म के

पुण्य फलित

वे,

अनुशासन

मन भाया थे.

नव

स्वार्थवृत्ति लख

लगता है

भवितव्य हमारे

नहीं रहे.

पितृव्य हमारे

नहीं रहे….

*

वे

हर को नर का

वन्दन थे.

वे

ऊर्जामय

स्पंदन थे.

थे

संकल्पों के

धनी-धुनी-

वे

आशा का

नंदन वन थे.

युग

परवशता पर

दृढ़ प्रहार.

गंतव्य हमारे

नहीं रहे.

पितृव्य हमारे

नहीं रहे….

*

वे

शिव-स्तुति

का उच्चारण.

वे राम-नाम

भव-भय तारण.

वे शांति-पति

वे कर्मव्रती.

वे

शुभ मूल्यों के

पारायण.

परसेवा के

अपनेपन के

मंतव्य हमारे

नहीं रहे.

पितृव्य हमारे

नहीं रहे….

*

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3 टिप्पणियाँ

  1. Murari Pareek said,

    सितम्बर 23, 2009 at 7:19 पूर्वाह्न

    ati sunrdar sradhanjali

  2. Suman said,

    सितम्बर 23, 2009 at 5:32 अपराह्न

    नव

    स्वार्थवृत्ति लख

    लगता है nice

  3. सुशील कुमार said,

    सितम्बर 24, 2009 at 2:38 पूर्वाह्न

    पिता जी को दु:ख भरे हृदय से श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ और ईश्वर से प्रार्थना कि भाई श्री संजीव सलिल जी दु:ख सहने की शक्ति प्रदान करे!


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