कहानी

झारखंड का प्रकाश स्तम्भ साहित्यकार राधकृष्ण जी की एक अनुपम कृति-

यह मिथिला है। देखिए, गाँव के किनारे कोसी नदी बहती जाती है। सामने वह बूढ़ा पीपल है। पीपल के नीचे कभी का तालाब है। वहाँ पक्का घाट है। पुराने जमाने के किसी जमींदार ने इस घाट को बनवाया था। अब के जमींदार तो मुकदमा लड़ते हैं, मैनेजर और रंडी रखते हैं, शराब पीते हैं, और बंगला बनवाते हैं। घाट-वाट बनवाने के फेरे में नहीं पड़ते। सो घाट र्की इंटें दरक गयी है, पलस्तर छूट गया है, टूटी सीढ़ियों में काई जमी रहती है। यह घाट हमारे काम का नहीं। वहाँ तो बस स्त्रियाँ नहाती है। हम बाल-गोपाल घाट की बगल से नदी में उतरते हैं। वहीं गाय और भैंसों को धोते हैं, छपाछप खूब स्नान करते हैं और सर्र-सर्र पानी में तैरते हैं। उस पीपल पर, कहते हैं, भूत भी ऐसा कि ब्रह्मपिशाच। गाँव वाले कहते हैं कि रात को वह घाट पर बैठा रहता है। अगर कोई उधर जा निकला, तो उसे मार डालता है। हम लोग रात में कभी उधर गये ही नहीं। जाने की कभी जरूरत ही नहीं पड़ी। पता नहीं ब्रह्मपिशाच की बात कहाँ तक सच है।

बस्ती हमारी बड़ी है। यहाँ ताड़ के पेड़ है। पासी अपने पैर में फंदा लगाकर उसके ऊपर तक चला जाता है और लबनी में भरकर ताड़िया उतार लाता है। खजूर के पेड़ है और रसीले आम के पेड़ हैं। हमारे यहाँ आम को आप दरभंगिया आम कहते हैं। आम समूची मिथिला में होता है; लेकिन आप लोग हमारे आम और महाराजाधिराज को सिर्फ दरभंगा का ही बतलाते हैं। दरभंगा तो सिर्फ एक शहर है। वहाँ कचहरी, महाराजाधिराज का किला है। उस शहर में डिपटी और वकील लोग रहते हैं और मुकदमा हुआ करता है। हमारे गाँव से बहुत-से लोग सत्तू-पोटली बांधकर बगल में कागजों का बस्ता लेकर मुकदमा लड़ने के लिए दरभंगा में जाया करते हैं। दरभंगा यहाँ से दूर है। हमारे यहाँ जिस सूरज का उजाला होता है, वहाँ रात में उसी तरह बिजली जगमग करती है। वहाँ आग और पानी से चलनेवाली रेलगाड़ी भी है, मोटरों को लोग एक दुर्गन्धित तेल से चलाते हैं; लेकिन उन बातों की विशेष जानकारी मैं आपको नहीं दे सकूंगा, क्योंकि एक तो मैं लड़का हूँ, दूसरे मैं कभी दरभंगा गया ही नहीं।

मैं आपको अपनी बस्ती की भी पूरी जानकारी नहीं दे सकता। यह बहुत बड़ी बस्ती है और मेरा ख्याल है कि सात कोड़ी से भी अधिक घर होंगे। इसी गाँव में भूखन साह रहते हैं। उनके यहाँ की औरतें रंगीन साड़ी पहनती हैं, आँखों में सुरमा माँजती हैं और सोने-चाँदी के आभूषण पहनकर झमाझम चलती हैं। उन्हीं की लड़की की शादी में हमने पहले-पहल हाथी देखा था। गाँव में सूदन झा, लखन झा, बिरजू झा आदि बड़े-बड़े पंडित हैं। ये लोग छान कर पानी पीते हैं और रोज रोहू मछली छोड़कर दूसरी मछली बिलकुल नहीं खाते। टेमन साव, टेसा साव, सकूर मियाँ आदि यहाँ बड़े-बड़े महाजन हैं। उनके यहाँ आदमी को पाँच कोड़ी तक कर्ज मिल सकता है। मास्टर इसी गाँव के रहने वाले हैं, जिनकी विद्या का तो कहना ही क्या। वे अंग्रेजी भी जानते हैं और किताबों को शुरू से आखीर तक पढ़ जात हैं। सुचित झा इसी गाँव के नेता है, जो कहते थे कि हमको स्वराज्य लेना ही होगा। वे बड़े अच्छे आदमी थे और बहुत-सी बातें बतलाया करते थे। हर हप्ता उनके पास एक अखबार आता था। उसमें वनस्पति घी और स्वराज्य की अच्छाई के बारे में बहुत-सी बातें लिखी रहती थी। प्रति सप्ताह उसमें दाद की दवा और डोंगरे के बालामृत का वृतांत छपता था। काका सुचित झा उसे आदि से अंत तक पढ़ते थे और पूछने पर कुछ हम लोगों को भी बतला देते थे। उन्हीं दिनों की बात है कि सुचित झा इस गाँव में एक बहुत बड़े नेता को बुला लाये थे। आनेवाले उस नेता की मूँछें घुटी हुई थीं, भारी-भरकम शरीर था। वे चश्मा लगाकर गंेदा फूल की माला पहने हुए थे। उस दिन आम की बगिया मंे दरी बिछाई गयी थी और बड़ा समारोह हुआ। हम सभी लड़के इस घटना से बहुत प्रसन्न थे और ऊँची आवाज में ‘जय-जय’ चिल्लाते थे। उस नेता ने बहुत बड़ा भाषण दिया। वह युद्ध का विरोध करते और हर एक आदमी को चर्खा चलाने का उपदेश देते थे। मगर काका सुचित झा को छोड़ गाँव में दूसरा चर्खा चलानेवाला नजी नहीं आया। लोग कहते थे, इसमें मजदूरी कम है। अगर दूसरा कोई काम करता है, तो दो पैसा ज्यादा मिला जाता है। यह सब बहुत दिनों की बात है। अब तो हमारे नेता सुचित झा भी जेल में बन्द हैं। पुत्र-शोक में घुल-घुलकर उनकी माँ ने दम तोड़ दिया। मरने के बाद घर में कफन के लिए कोड़ी भी नहीं थी। केले के पत्ते से ढापकर उनकी लाश उठाई गयी। सुचित काका की स्त्री आजकल पिसाई करती है और पैबन्द लगी साड़ी पहनती है। उसने बताशा बेचने का भी काम किया था; लेकिन चीनी के अभाव में वह बन्द कर देना पड़ा। पिसाई के अलावा वह गुड़िया बनाती है और गाँव की लड़कियों के हाथ धेले-पैसे मेें बेचा करती है। सब जानते हैं कि सुनैना काफी बड़ी मुसीबत में है; लेकिन कोई उसकी मदद नहीं करता। टेमन साव और टेसा साव के पास बहुत पैसे हैं; लेकिन वे उसे कर्ज नहीं देते। अगर सुचित काका किसी भाँति स्वराज्य ले-लें, तो उससे इन्हीं अमीरों का ज्यादा लाभ होगा। मगर ये लोग हैं; जो सुनैना काकी की काई मदद नहीं करते। हम लोग तो छोटे-छोटे लोग हैं। हम लोग क्या कर सकते हैं। हमारी सुनैना काकी बिचारी एक शाम खाती है, दूसरे शाम उपवास रह जाती है। पूछते हैं, तो कहती है कि बेटा रात के समय मुझे भूख नहीं लगती। क्या जाने उसे भुख नहीं लगती। मुझे तो रात को भी ऐसी भूख लगती है कि क्या पायें और खा जायँ।

उसी सुनैना काकी की बगल में मेरा घर है। जाति के हम लोग सुनार हैं। बाबूजी का गहना गढ़ने में नाम है। कंगन, बिछिया, हँसुली, हार आदि वे बड़ा बढ़िया बनाते हैं। मगर गाँव में गहना गढ़नेवाने का शौक नहीं है, तो क्या किया जाय? थोड़ी-बहुत खेती है, उसी से गुजारा है। गाय का दूध है, भैंस की छाँछ है, गुड़ की मिठाई है। गाँव में हम लोग खाते-पीते अच्छे हैं। छम्मी मेरी छोटी बहन है। कभी-कभी वह जिद मचा देती है कि हम घी की मिठाई खायेंगे; लेकिन मेरा तो दावा है कि घी की मिठाई दरभंगा छोड़कर और कहीं बन नहीं सकती। छम्मी छोटी है। उसे अक्ल कहाँ?

सुचित काका का जेल में जाना था कि गाँव में काया-पलट हो गयी। हम हैरान थे कि क्या हो गया। गुुड़ की भेली जो हम लोग पैसे में दो लेते थे, वह अब तीन पैसे में सिर्फ एक मिलने लगी। भूखन साहू ने अपनी दूकान बन्द कर ली। अब न वे हल्दी देते थे, न धनिया ही बेचते थे, सीधे कह देते थे कि है ही नहीं; लेकिन मैं जानता हूँ कि सारी चीजें उनके यहाँ थीं। खुद मेरे बाबूजी उनके यहाँ जाते थे और चिरौरी करके किरासन तेल ले आते थे। कहते थे कि बारह आने बोतल लगता है। लगता रहेगा। अम्मा के लिए एक ही साड़ी बारह रुपयों में आई थी। इसके लिए बाबूजी को सवा मन चावल बिक्री करना पड़ा था। फिर हमारे लिए धोती चाहिए। छम्मी मचलती थी कि वह तो लाल साड़ी लेगी। एक लालटेन खरीदे की भी सख्त जरूरत थी। इसके लिए हमारे तमाम गेहूँ बिक गये। चावल का एक दाना भी नहीं रहा, पुआल के बिना गाय भूखी रहने लगी। सिर्फ कपड़ा-लत्ता और लालटेन खरीदने के पीछे ही हमलोगांे की लेई-पूंजी साफ हो गयी। पिताजी उदास रहने लगे कि अब क्या होगा?

पिताजी चिन्ता से दुबले होने लगे कि एक दिन दोपहर के समय वे बुरी तरह काँपने और हाँपने लगे। उन्हें बड़े जोर का बुखार आया था कि रात-भर वे मुँह फाड़ कर पड़े रहे। बार-बार पानी मांगते थे और अर्र-अर्र बोलते रहे। जब चूप रहत थे, उस समय मुँह फाड़े रहते थे। रात-भर के बाद दूसरे दिन जैसे ही सूरज निकला कि बाबूजी के शरीर से पसीना छूटने लगा। सााा शरीर पसीने से सराबोर हो गया। बुखार छूट गया, सिर्फ कमजोरी बाकी बची।

सबका ख्याल था कि अब बुखार से पिंड छूटा; लेकिन दूसरे दिन फिर शाम को बाबूजी के साथ वही तमाशा हुआ, उसी तरह शरीर दलदलाने लगा। बुरी तरह काँपने लगे, रजाई दी गयी, कम्बल दिया गया। मेरा, छम्मी का, अम्मा का, सबका ओढ़ना-बिछौना उनके शरीर पर लाद दिया गया; लेकिन कँप-कँपी ऐसी थी, जो नहीं छूटती थी। उसके बाद भयानक बुखार आया और पिताजी ने आँख बन्द करके अपना मुँह फाड़ दिया। हमने तो समझा कि बाबूजी मर ही गये। सुचित काका की अम्मा मरी थी, तो इसी भाँति आँखें बन्द थी और मुँह खुला था। इस बात से मुझे बहुत ही डर मालूम हुआ। अम्मा से अपना सन्देह प्रकट किया, तो वह मुझ पर चाँटा मार बैठी। रोता-सिसकता मैं सो गया। फिर सबेरे उठकर देखता हूँ कि बाबूजी के पसीना छूट रहा है और बुखार उतर रहा है।

अम्मा के गहने बिक गये, वत्र्तन बन्धक रख दिये गये। कुछ दिन के बाद एक दाढ़ीवाला आदमी आया और हमारी तमाम गायों को खूँटे से खोल ले गया। हम रोने लगे, ढेला लेकर मारने के लिए दौड़े। पिताजी ने डाँट दिया, बोले- हमारी गायें इन्होंने खरीद ली हैं।

मैने रोते हुए कहा-यह तो कसाई है। हमारी गायों को काट देगा। तब बाबूजी ने मुझे जोर के डाँटा कि मैं सहम उठा। शायद यह सच्ची बात कहना मुझसे कसूर हो गया था। यह मेरा कैसा अपराध था। अपनी सूनी गोशाला के कोने में बैठकर मैं सुबक-सुबक कर रोने लगा।

माँ खाना खिलाने को आई, तो मैंने साफ जवाब दे दिया-जब तक मेरी गायें नहीं आयेंगी, तबतक मैं नहीं खाऊँगा।

मगर मेरी टेक निभी नहीं।

बाबूजी का वही हाल था। रोज बुखार आता और सबेरे छूट जाता। दुबले-पतले कंकाल-सरीखे दिखाई देते थे। सारा शरीर काला पड़ गया था। आँखें भयावनी हो गयी थी। बाबूजी की बीमारी में एक दूसरी नयी बात सुनने में आयी। उन्हें एक दवा मिलती नहीं थीं उस दवा का नाम है कुनैन। पता नहीं यह कैसी अचम्भे वाली दवा है। बाबूजी ने तमाम सूराग लगाया, हर जगह छान मारा; लेकिन उन्हें वह दवा मिली ही नहीं। पहले मैंने सुना था कि लोगों को साँप की मणि नहीं मिलती। दूसरे मैंने सुना था कि सोने के पहाड़ को खोदकर भी नहीं पा सकता। तीसरे मैंने यही देखा कि हजार कोशिश के बाद भी कुनैन नाम की चीज नहीं मिल सकती।

मगर थोड़ा-सा खटका बना ही रहा। एक दिन मैंने सुनैना काकाी से कहा-ऐसा तो हो ही नहीं सकता कि कुनैन नहीं होगा। दुनिया में कहीं-न-कहीं बहुत-सा कुनैन जरूर होगा।

सुनैना चाची ने धीरे से हँस दिया।

मैंने कहा-दरभंगा में जो बड़ा-सा सरकारी अस्पताल है, जहाँ से लोग पढ़-पढ़ कर डाॅक्टर बनते हैं, क्या वहाँ भी कुनैन नहीं होगा? मैंने कहा-हमारे महाधिराज के यहाँ, तो जरूर होगा। अगर उनके यहाँ नहीं हो तो जो उनके राजराजेश्वर हैं, उनके यहाँ तो जरूर होना चाहिए। चाची, वे लोग कुनैने क्यों नहीं बाँटते?

चाची-लड़ाई है बेटा, उसी कारण कुनैन नहीं मिलता।

बात मेरी समझ में नहीं आयी। मैंने कहा-जब लड़ाई ही करनी थी, तो थोड़ा कुनैन अपने पास जरूर रख लेना चाहिए था। ऐसी लड़ाई किस काम की कि पास में मारने की सब चीजें हैं और जिलाने की कोई चीज नहीं। अगर इस गाँव में हर किसी को बुखार हो जाये, तो सरकार का ही तो नुकसान होगा। हम लोग भी सरकार के ही आदमी हैं चाची? पिछले महीने में रामरतन फौज में भर्ती होकर चला गया। हम भी बड़े होंगे, तो हम भी भर्ती होंगे। मगर हमें बुखार लग तब तो हमसे भला क्या लड़ाई होगी।

चाची ने कहा-जो सबसे बली हैं; वही सरकार जिसको जो चाहे, सो कर सकती है। अगर सरकार कुनैन नहीं रखती, तो तुम इसके लिए कुछ भी नहीं कह सकते।

मैंने कहा-क्यों नहीं कहँूगा; बेशक कहूँगा।

चाची ने झुँझलाकर कहा-तो तुम्हें भी जेल चला जाना पड़ेगा-समझ लो।

मेरा दिल दहल गया। जेल सुनते हैं कि वहाँ से आदमी निकल ही नहीं सकता। सुनते हैं कि एक जिला हैं भागलपुर; सो वहाँ की जेल में सरकार ने गोली चला दी। भगवान जाने, जेल में हमारे सुचित काका कैसे होंगे। जेल का नाम सुनते ही मेरा मुँह सूख गया।

फिर भी विश्वास नहीं होता था। बोला-सिर्फ जरा-सी बात कहने के लिए सरकार जेल नहीं देगी।

चाची ने कहा-तुम्हारे काका ने क्या किया था? उन्होंने सिर्फ गांधीजी की जय कही और उन्हें जेल में डाल दिया गया। बोलो, इसके सिवा उन्होंने और क्या किया था?

बात सही थी। मेरा कलेजा धड़कने लगा। कहीं सरकार को मेरी बात मालूम नहीं हो जाय।

चाची ने समझाया-बेटा, ऐसी बात नहीं कहते।

ठीक है, मुझे समझाना चाहिए था। अब कभी नहीं कहूँगा।

गाँव में केवल हमारे बाबूजी ही बीमार नहीं थे। रामधन का भी यही हाल था। शिवटहल महीनों से इसी बीमारी को भुगत रहा था। जानकी तो इसी बीमारी में मर गया।

और दिन आ रहे थे और दिन जा रहे थे।

घर की हालत क्या बतलावें। बाबूजी ने अनाज इसी भरोसे बेच दिया था कि सस्ती होगी, तो खरीद लेंगे, मगर सस्ती कहाँ तक होगी कि रुपये में सवा सेर का चावल बिकने लगा। अगहन का महीना आया; लेकिन मेरे घर में धान बिलकुल ही नहीं आया। पूछने पर अम्मा ने बताया अबकी धान भूखन साहू ले जायेंगे।

क्यों?-मैंने पूछा।

क्योंकि तुम्हारे बाबूजी ने दवा कराने के लिए उनसे रुपये लिए हैं-अम्मा बोली।

मैंने क्रोध से कहा-वे अपने रुपये लेंगे कि हमारा धान भी लेंगे।

अम्मा बोली-वे अपने रुपये लेंगे और हमारा धान भी लेंगे। खेत उनके हाथ में जरपोशी दी गयी है।

तब हम खायेंगे क्या?

अम्मा रोने लगी-बेटा, तुम्हारे बाबूजी अच्छे हो जायेंगे तो फिर सब हो जायेगा। अभी दुख के दिन है। सब्र करो।

शाम को मैं सुनैना काकी के पास गया। उनसे पूछने लगा-चाची, सब्र करने का क्या फल होता है?

चाची बोली-बेटा सब्र का फल बहुत मीठा होता है।

तब मैंने ख्याल किया कि मुझे सब्र ही करना चाहिए। अपने लिए नहीं तो बाबूजी के लिए तो मुझे जरूर सब्र करना चाहिए।

इधर घर में मुझे छूछा भात मिलने लगा। दूसरे शाम वह भी नदारद हो गया। मैं अम्मा की गोद में दुबकरकर सो जाता था। मुझे मालूम था कि सब्र का फल मीठा होता है। मेरी छोटी बहन छम्मी नासमझ थी। वह भूख-भूख रटती थी। आप परेशान होती थी और अम्मा को भी परेशान कर देती थी। छम्मी नहीं जानती कि सब्र करने का फल क्या मिलता है।

खाने के लिए छूछा भात हो गया। माड़ मंे थोड़ी-सी हल्दी मिला देने से वह दाल का मजा देती थी। तरकारी के नाम पर जरा-सी चटनी हो जाय, तो वही बहुत।

ऐसे इस तरह के दिन भी आने लगे और जाने लगे।

कि, लो, अब अम्मा का भी वही हाल हो गया। सबेरे के पहर उनके शरीर में कँपकँपी होने लगती। दिन भर बुखार में पड़ी रहती।

दिन में बाबूजी के बिना? सुनते हैं कुनैन जापानियो के हाथ में है। मैं पूछता हूँ सिर्फ कुनैन के लिए ही जापानियों को नेस्तनाबूद क्यों नहीं किया जाता। सबसे पहले कुनैन मिलना चाहिए। पहले कुनैन की लड़ाई हो। फिर बाकी लड़ाई पीछे होती रहेगी। रात के समय मैं सोचा करता था, मैं जापानियों से जूझने जा रहा हूँ। मेरे पीछे बहुत बड़ी सेना है। तमाम जापानी मारे जाते हैं। अब पृथ्वी पर एक भी जापानी नहीं, अब कुनैन निर्बन्ध है। मैं पुकारता-आओ, कुनैन ले जाओ! सभी दौड़ते हैं। कितने लोग हैं, क्या मैं इन्हें कभी गिन भी सकता…? अम्मा मेरी बलैया लेती है, पिताजी मुझे आशीर्वाद देते हैं। मगर भूखन साहू को मैं कभी कुनैन नहीं दे सकता। वह हमारा सारा धान उठाकर ले गया है।

गर्मी के दिन किसी-किसी भांति बीत गये। अब बरसात बायी है। झमाझम मूसलाधार वृष्टि हो रही है। रात का समय। बाबूजी बुखार में पड़े हैं, अम्मा की तबियत भी अच्छी नहीं है। तमाम घर में अंधेरा छाया हुआ है। अब तो न किरासन का तेल है और न उसे खरीदने के लिए पैसे हैं।

आजकल तो मैं ही घर में कमानेवाला हूँ। दिन के समय लड़कों के साथ कोसी में मछलियाँ मारता हूँ। शाम होते ही किसी की फूलवारी में घूसकर कुछ फल और सब्जी का जुगार करता हूँ। इसी से घर चलता है। उस दिन भूखन साहू के यहाँ एक बैलगाड़ी खड़ी थी। उसमें चावल के बोरे लदे थे। अपने साथियों के साथ मिलकर हम लोगों ने एक पूरा बोरा ही उड़ा लिया। गाड़ीवानों को खबर भी नहीं हुई। इसमें मुझे तेरह सेर चावल का लाभ हुआ था। छम्मी भी समझदार हो गयी है। उसने भी अब सब्र करना सीख लिया है। अब वह लाल साड़ी पहनने के लिए जिद नहीं मचाती। फटा-पुराना चिथड़ा लपेट कर इधर-उधर जलावन के लिए सूखी लकड़ियाँ खोजती है। माँ को दिन भर बुखार लगता है, बाबूजी उठने-बैठने से लाचार हो गये हैं। छम्मी खुद बनाती है। उसे बनाना भी नहीं आता। सब्जी में नमक भी नहीं डालती। पूछता हूँ तो कह देती है कि घर में है ही नहीं तो मैं क्या करूँ। अब उस नासमझ को कौन समझावे। भूखन साहू के यहाँ बोरा का बोरा नमक पड़ा रहता है। जरा नजर इधर-उधर हुई कि एक मुट्ठि गायब कर दिया। कौन देखता है। इतने ही से काम चल जाता। बिना नमक के भोजन बेस्वाद मालूम होता है।

रात का समय है। घर में अंधेरा छाया हुआ है। बाबूजी बुखार में बेहोश हैं, छम्मी सो रही है। अम्मा और मैं जाग रहा हूँ। आज मेरी तबियत सुस्त है। आज मुझे जमींदार के भण्डारियों ने मारा है। हम लोग रहर और सरसों चुरा रहे थे कि साला बिसेसरा किधर से आ गया। और लड़के तो फुर्र हो गये, केवल मैं ही पकड़ लिया गया। इसके बाद उसने छड़ी से, घूँसे से, थप्पड़ से मेरी खूब मरम्मत की। तीन बार थूककर चटवाया, तब जान छोड़ी। उस समय तो उसने जान छोड़ दी, लेकिन अभी मालम होता है जैसे जान जरूर चली जायेगी। सारा शरीर घाव की तरह दर्द कर रहा है। डर से कराहता भी नहीं हूँ कि अम्मा सुनेगी, तो पूछेगी। अम्मा से कहने की यह बात नहीं है, कहा भी नहीं। अगर बाबूजी से कह दूँ, तो बिसेसर के छक्के छुड़ा देें। अब वे अच्छे हो जायँ। बीमारी की हालत में यह बात सुनेंगे तो रोने लगेंगे।

तमाम सन्नाटा है। मालूम होता है, जैसे सारा गाँव मर गया है। बरसात का पानी बरस रहा है। बस झमाझम उसी की आवाज है। इसी समय एक भयानक आवाज सुनता हूँ-छम्मी की अम्मा!

अम्मा चिहुँक उठती है, मैं डर जाता हूँ-मालूम होता है, जैसे कोई औरत चिल्ला रही है और कय कर रही है। मैंने धीरे से कहा-चुड़ैल!

अम्मा ने मुझे अपनी छाती से चिपका लिया।

छम्मी की अम्मा!-फिर आवाज सुनाई पड़ी। मालूम हुआ जैसे सुनैना काकी की आवाज है।

माँ उठकर बाहर गयी। थोड़ी देर के बाद वापस आकर बोली-उन्हें हैजा हो गया है! कय और दस्त हो रहे हैं। तू चुप सो जा, मैं उनकी सेवा को जा रही हूँ।

सबेरे सुनैना काकी की मृत्यु हो गयी थी और मेरी अम्मा को कय होने लगे थे। अनजान में ही दस्त निकल जाता था। जब मैंने उन्हें देखा तब उनकी पिंडलियाँ ऐंठ रही थीं, बार-बार तेज हिचकी आती थी। शरीर काँप उठता था। मुझे देखकर उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।

मैंने समझाया-ठहरो अम्मा, घबराओ नहीं, मैं लोगों को बुलाये लाता हूँ। और दौड़ा हुआ बाहर निकला।

जगेसर के यहाँ गया। उसने बतलाया मुझे खेत में जाना है। सीताराम के तीन बच्च्े इसी बीमारी में पड़े थे। रामधन की माँ ने इसी बीमारी से दम तोड़ दिया था। मालूम हुआ कि तमाम गाँव में हैजा फैल गया है। घर-घर में लोग बीमार हैं और मर रहे हैं। सामने सारा गाँव था, लेकिन हमारे लिए कहीं कोई नहीं था। सबको अपनी-अपनी पड़ी थी। कोई भी आने को तैयार नहीं हुआ।

आखिर मेरा मित्र रामनाथ काम में आया। वह मुझसे उम्र में बड़ा है। सात महीना दरभंगा में रह आया है। वह बहुत-सी बातें जानता है और बड़ा हिम्मतवाला आदमी है। उसने दो-चार दोस्तों को और जमा किया। सबके साथ जिस समय हम घर पहुँचे उस समय देखा कि माँ की दोनों आँखें खुली हैं, एक टक। सारा शरीर ऐंठ गया है। बदबू के मारे नाक नहीं दी जाती। वे बरामदे मंे पड़ी हुई थीं और उनके सारे शरीर पर मक्खियाँ भिनभिना रही थीं।

रामनाथ ने कहा- यह तो मर गयी!

मैं चैंक उठा।

छम्मी बोली-अभी थोड़ी देर पहले तो पानी मांगती थी।

नहीं, मरी नहीं है। सुनैना काकी भी तो इसी तरह पड़ी हुई है।

रामनाथ ने कहा-अरे नहीं पगली, यह मर गयी। अब इन्हें ले चलना होगा।

रामनाथ ने एक चारपाई पर सुनैना काकी और अम्मा को सुला दिया। हम चारों-पाँचों उन्हें ले चले। बाबूजी में तो इतनी शक्ति भी नहीं थी कि वे बिस्तर से उठ सकते। राह में रामनाथ बहुत ही आश्यचर्यजनक बात कर रहा था-मरने पर आदमी की लाश भारी हो जाती है, जब तक आदमी जिन्दा रहता है, तबतक हल्का रहता है।

इसी तरह की बातें करते हुए हम श्मशान पहुँचे। रामनाथ के साथ रहकर हमलोग निश्चिन्त थे। वह हमलोगों का अगुआ था।

श्मशान में पहुँच कर हमलोगों ने देखा, कुछ चिताएँ जली हुई हैं, कुछ बुझी हुई हैं, वहाँ हमने टेसा साव को देखा। उनकी लड़की मर गयी थी। सूदन झा, लखन झा, बिरजू झा आदि सभी बड़े-बड़े पंडित उनके साथ मसान में आये थे। दो-तीन और लाशें थीं। ऊपर चील मँडरा रहे थे। तमाम चिरायँध गंध फैली हुई थी। हमलोग बैठ गये और विचार करने लगे कि अब क्या हो। इसी समय हमने रघु चमार को देखा। वह खुद ही हमलोगों के पास आया और कहने लगा-महामारी के दिनों में लाश नदी में बहा जाती है। एसे समय लकड़ी कहाँ-कहाँ खोजते फिरेंगे। अपनी औरत को मैं खुद लेता आया था और बहाकर वापस हा रहा हूँ। तुम लोग भी यही करो।

यह सीख देने के बाद वह ठहरा नहीं। आने घर की ओर वापस चला गया। उसे अपनी मौसी और बच्चों की खबर लेनी थी। रामनाथ ने मुझसे कहा-तुम भी ऐसा ही करो।

सबको यही राय जँच गयी।

पहले सुनैना काकी की लाश बहाई गयी। मैंने उनकी डूबती हुई लाश को देखकर कहा-जाओ काकी, दुनिया में तुमने कष्ट किया है, लेकिन भगवान के दरबार में तुम्हें सुख मिलेगा।

माँ की लाश डूबाते समय तो मेरी आँखों से आँसू बहने लगे। बहुत ही ढाढ़स के साथ मैंने माँ को आश्वासन दिया-तुम सुख से जाओ, मेरी कोई चिन्ता नहीं करना। अब से बाबूजी की देख-रेख मैं ही करूँगा। छम्मी को सुख से रखूँगा। वह बड़ी होगी, तो उसकी शादी कर दूँगा। तुम हमलोगों की जरा भी चिन्ता नहीं करना।

और उसे बाद मैं बिलख-बिलख कर बहुत ही रोने लगा।

घर लौटने में मुझसे देर हो गयी थी। राह में मेरे मित्र रामनाथ के साथ अलग हो गये थे। अकेले घर में लौटा। मुझे देखते ही पिता जी ने चिल्लाकर कहा-तू कहाँ चला गया था? देखता नहीं, मुझे कय और दस्त हो रहे हैं। ला, पानी ला; थोड़ी-सी चावल की माड़ दे दो। श्रीराम वैद्य को बुला ला।

मैं व्यस्त होकर फिर रामनाथ के यहाँ दोड़ा।

रात के समय रामनाथ और छम्मी बाबूजी की लाश लेकर श्मशान जा रहे थे। घर में मुर्दा नहीं रखना चाहिए। रामनाथ का कहना कि इससे बीमारी और दुर्गंध फैलती है। बाबूजी का लाश अम्मा की भाँति भारी नहीं थी, फिर भी छम्मी कहतीं थीं-बड़ा भारी है, मुझसे चला नहीं जाता।

श्माशान में पहुँचते ही छम्मी ने कय किया और काँपने लगी। उसने बतलाया कि घर पर ही मुझे तीन-चार दस्त हो चुके थे; लेकिन मैं डर से किसी को नहीं बतलाया।

रामनाथ ने पूछा-किसका डर से, पगली?

मरने का!-छम्मी ने कहा। काकी, बाबूजी और अम्मा को मरते देख कर मुझे बहुत डर लगता था। थोड़ा पानी दो।

रामनाथ उसके लिए पानी लेता आया। मुझसे बोला-सुनता है रे, इस छम्मी को भी हैजा हो गया।

तब?-मैंने पूछा।

चलो, किसी पेड़ के नीचे बैठ जायँ। अगर किसी तरह इस घर में ले भी जायंेगे, तो मरने के बाद फिर लाना पड़ेगा। इससे अच्छाा हे कि उस बरगद के नीचे बैठ जायँ। अभी पानी भी नहीं है। आसमान में चाँद निकल आया है। तू जाकर एक लोटा ले आ।

रामनाथ की बात ठीक थी। घर भी श्मशान से कम नहीं था। जा आराम घर में या वही आराम इस बरगद के नीचे भी दिखाई देता था। बाबूजी की लाश को रखकर छम्मी को लिये हुए बरगद के नीचे चले गये, फिर मैं लोटा लाने के लिए दौड़ गया।

लोटा लेकर जब वापस आया तो मालूम हुआ कि छम्मी के दस्त कम हो गये है; लेकिन प्यास बहुत है। पानी पीती है और कय कर देती है। कहती थी, शरीर में बहुत जलन है और वह बड़ी तेजी से चिल्ला उठती थी। दाँत किट-किटाती थी और हमलोग कुछ कहते थे, तो सुनती ही नहीं थी।

फिर वह सुस्त हो गयी। सिर्फ कराहती थी और किसी बात का कोई जवाब नहीं देती थी।

मैंने रामनाथ से पूछा-यह ऐसा क्यों करती है? बोलती क्यों नहीं?

रामनाथ ने इस बात का कोई जवाब नहीं देकर कहा-राम-राम कहो। और वह उच्च स्वर में राम-राम पुकारने लगा।

मैंने घबराकर पूछा-रामनाथ सच बतलाओ यह क्या हुआ।

रामनाथ ने कहा-यह मर रही है।

छम्मी भी मर रही है? माँ मर गयी, बाप मर गये, सुनैना चाची भी मर गयीं और अब छम्मी मर रही है; अब मैं कैसे रहूँगा? मैं रोने लगा। रोते-रोते पुकारा छम्मी।

कोई उत्तर नहीं।

छम्मी!

फिर भी कोई उत्तर नहीं। हाय, अब किसके साथ रहूँगा? किसके लिए मछली मारने जाऊँगा और किसके लिए अमरूद चुराकर लाऊँगा? छम्मी बोलती क्यों नहीं? मैंने बिलखते हुए कहा-दुनिया में जिसका राज्य है, वह हमारी नहीं सुनता; लेकिन स्वर्ग में तो भगवान का राज्य है, वे सबकी सुनते हैं। उनसे तू हमारे बारे में कहना। छम्मी, तू उनसे हमारे दुखों के बारे में जरूर कहना।

क्या छम्मी ने भगवान से हमारे बारे में कुछ कहा होगा? कुछ कहा होगा, तो भगवान ने भी अभी तक…जाने दो, मैं अपना किस्सा खत्म करता हूँ।

Advertisements

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: