हाईटेक पूजा

एक नवीनतम और अनोखा अनुभव, संस्मरण के रूप में पोस्ट करने की इच्छा को रोक पाना कठिन हो रहा है मेरे लिए। करीब एक महीना पहले की घटना है। मेरा लड़का चंचल, जो कि आजकल बेंगलोर में शिक्षार्थी है और अपने बड़े भाई सदृश वसंत के साथ रहता है, का फोन आया कि वसंत भैया सत्यनारायण प्रभु की पूजा करवाना चाहते हैं, लेकिन यहाँ पर पण्डित जी कम से कम ११०० रु० दक्षिणा के रूप में माँग कर रहे हैं। पूजा की सारी तैयारियाँ हो चुकीं हैं, लेकिन इतनी रकम दक्षिणा के रूप में देना संभव नहीं है। अब क्या करें?

मैं भी सोचने को विवश हो गया। फिर मैंने हँसते हुए मजाक में कहा – क्या फोन पर मैं जमशेदपुर से ही पूजा करा दूँ? मजे की बात है कि बच्चे इसके लिए तैयार हो गए। मैं भी आफिस से आकर पुनः बेंगलोर फोन लगाया। उनलोगों को सारी बातें समझायी। मोबाइल फोन वालों की दुनिया भी कुछ अलग होती है। कई प्लान ऐेसे हैं जिसमें अनलिमिटेड फ्री बातचीत की जा सकती है। ठीक इसी प्रकार की किसी योजना के तहत इन्डिकोम टू इन्डिकोम फ्री बातचीत हो सकती थी। मैंने भी सोच लिया कि अब यह ऐतिहासिक पूजा हाईटेक का इस्तेमाल करके करवा ही दूँ।

घर आकर पूजा करवाने के भाव से खुद को तैयार किया। सामने पूजा वाली पुस्तक को रखकर फोन लगाया और बेंगलोर वाले फोन का स्पीकर आन करवा दिया। मंत्रोच्चार के साथ पूजा शुरू हुई। मैं जो भी मंत्र पढ़वाता उधर से भी रिपीट होता था जिसे मैं आसानी से सुन भी सकता था। बीच बीच में उधर से मत्रोच्चार की गलतियों को भी सुधार करवाता गया। अन्ततोगत्वा पूजा की कार्यवाही कथा सहित रीति रिवाज के अनुसार समाप्त हुई। बच्चे काफी खुश थे, साथ में मैं भी कि नये तकनीक का इस्तेमाल करके एक नये तरीके से पूजा करवाने का एक छोटा प्रयास तो किया। मैं नहीं जानता कि यह कितना अच्छा या बुरा काम हुआ? लेकिन खुशी इस बात की है कि तथाकथित ऐसे पण्डितों का मोनोपोली तोड़ने की दिशा में कुछ तो किया।

अर्थी तो उठी..३ (अन्तिम)

पिछली किश्त में मैंने बताया की, तसनीम की दिमागी हालत बिगड़ती जा रहे थी…लेकिन उसकी गंभीरता मानो किसी को समझ में नही आ रही थी…

उसे फिर एकबार अपने पती के पास लौट जाने के लिया दबाव डाला जा रहा था..जब कि, पतिदेव ख़ुद नही चाहते थे कि,वो लौटे…हाँ..बेटा ज़रूर उन्हें वापस चाहिए था..!

हम लोग उन दिनों एक अन्य शहर में तबादले पे थे। दिन का समय था…मेरी तबियत ज़रा खराब थी…और मै , रसोई के काम से फ़ारिग हो, बिस्तर पे लेट गयी थी…तभी फोन बजा….लैंड लाइन..मैंने उठा लिया..दूसरी ओर से आवाज़ आयी,
” तसनीम चली गयी…” आवाज़ हमारे एक मित्र परिवार में से किसी महिला की थी…
मैंने कहा,” ओह ! तो आख़िर अमेरिका लौट ही गयी..पता नही,आगे क्या होगा…!”

उधर से आवाज़ आयी,” नही…अमेरिका नही..वो इस दुनियाँ से चली गयी और अपने साथ अपने बेटे को भी ले गयी…बेटी बच गयी…उसने अपने बेटे के साथ आत्महत्या कर ली…”
मै: ( अबतक अपने बिस्तर पे उठके बैठ गयी थी)” क्या? क्या कह रही हो? ये कैसे…कब हुआ? “

मेरी मती बधीर-सी हो रही थी…दिल से एक सिसकती चींख उठी…’नही…ये आत्महत्या नही..ये तो सरासर हत्या है..आत्महत्या के लिए मजबूर कर देना,ये हत्या ही तो है..’

खैर! मैंने अपने पती को इत्तेला दे दी…वे तुंरत मुंबई के लिए रवाना हो गए…
बातें साफ़ होने लगीं..तसनीम ने एक बार किसी को कहा था,’ मेरी वजह से, मेरे भाई की ज़िंदगी में बेवजह तनाव पैदा हो रहे हैं..क्या करूँ? कैसे इन उलझनों को सुलझाऊँ? ‘

तसनीम समझ रही थी,कि, उसकी भाभी को वो तथा उसके बच्चों का वहाँ रहना बिल्कुल अच्छा नही लग रहा था…उसके बच्चे भी, अपनी मामी से डरे डरे-से रहते थे..जब सारे रास्ते बंद हुए, तो उसने आत्म हत्या का रास्ता चुन लिया..पिता कैंसर के मरीज़ थे..माँ दिल की मरीज़ थी..तसनीम जानती थी,कि, इनके बाद उसका कोई नही..कोई नही जो,उसे समझ सकगा..सहारा दे सकेगा..और सिर्फ़ अकेले मर जाए तो बच्चे अनाथ हो,उनपे पता नही कितना मानसिक अत्याचार हो सकता है????

उसने अपने दोनों बच्चों के हाथ थामे,और १८ मंज़िल जहाँ , उसके माँ-पिता का घर था, छलांग लगा दी…दुर्भाग्य देखिये..बेटी किंचित बड़ी होने के कारण, उसके हाथ से छूट गयी..लेकिन उस बेटी ने क्या नज़ारा देखा ? जब नीचे झुकी तो? अपनी माँ और नन्हें भाई के खून से सने शरीर…! क्या वो बच्ची,ता-उम्र भुला पायेगी ये नज़ारा?

अब आगे क्या हुआ? तसनीम की माँ दिल की मरीज़ तो थी ही..लेकिन,जब पुलिस उनके घर तफ्तीश के लिए आयी तो इस महिला का बड़प्पन देखिये..उसने कहा,” मेरी बेटी मानसिक तौर से पीड़ित थी..मेरी बहू या बेटे को कोई परेशान ना करना॥”

इतना कहना भर था,और उसे दिलका दौरा पड़ गया..जिस स्ट्रेचर पे से बेटी की लाश ऊपर लाई गयी,उसी पे माँ को अस्पताल में भरती कराया गया..तीसरे दिन उस माँ ने दम तोड़ दिया…उसके आख़री उदगार, उसकी, मृत्यु पूर्व ज़बानी( dying declaration)मानी गयी..घर के किसी अन्य सदस्य पे कोई इल्ज़ाम नही लगा…!

इस बच्ची का क्या हुआ? यास्मीन के नाम पे उसके पिता ने अपनी एक जायदाद कर रखी थी..ये जायदाद, एक मशहूर पर्वतीय इलाकेमे थी…पिता ने इस गम के मौक़े पे भी ज़हीन संजीदगी दिखायी..उन्हीं के बिल्डिंग में रहने वाले मशहूर वकील को बुला, तुंरत उस जायदाद को एक ट्रस्ट में तब्दील कर दिया, ताकि,दामाद उस पे हक ज़माने ना पहुँच जाय..
और कितना सही किया उन्हों ने…! दामाद पहुँच ही गया..उस जायदाद के लिए..बेटी को तो एक नज़र भर देखने में उसे चाव नही था…हाँ..गर बेटा बचा होता तो उसे वो ज़रूर अपने साथ ले गया होता..

उस बेटी के पास अब कोई चारा नही था..उसे अपने मामा मामी के पासही रहना पड़ गया..घर तो वैसे उसके नाना का था…! लेकिन इस हादसे के बाद जल्द ही, तसनीम के भाई ने अपने पिता को मुंबई छोड़, एक पास ही के महानगर में दो मकान लेने के लिए मजबूर कर दिया..अब ना इस बच्ची को उनसे मिलने की इजाज़त मिलती..नाही उनके अपने बच्चे उनसे मिलने जाते..उनके मनमे तो पूरा ज़हर भर दिया गया..इस वृद्ध का मानसिक संतुलन ना बिगड़ता तो अजीब बात होती..जिसने एक साथ अपनी बेटी, नवासा और पत्नी को खोया….

इस बच्ची ने अपने सामने अपनी माँ और भाई को मरते देखा..और तीसरे दिन अपनी नानी को…! इस बात को बीस साल हो गए..उस बच्ची पे उसकी मामा मामी ने जो अत्याचार किए, उसकी चश्मदीद गवाह रही हूँ..इतनी संजीदा बच्ची थी..इस असुरक्षित मौहौल ने उसे विक्षप्त बना दिया..वो ख़ुद पर से विश्वास खो बैठी…कोई घड़ी ऐसी नही होती, जब वो अपनी मामी या मामा से झिड़की नही सुनते..ताने नही सुनती….अपने मामा के बच्चे..जो उसके हम उम्र थे…वो भी, इन तानों में, झिड़कियों में शामिल हो जाते…

ये भी कहूँ,कि, आजतलक,उस बच्ची के मुँह से किसी ने उस घटना के बारेमे बात करते सुना,ना, अपनी मामा मामी या उनके बच्चों के बारेमे कुछ सुना…जैसे उसने ये सारे दर्द,उसने अपने सीनेमे दफना दिए….

ट्रस्ट में इस बात का ज़िक्र था कि, जब वो लडकी, १८ साल की हो जाय,तो उस जायदाद को उसके हवाले कर दिया जाय..वो भी नही हुआ..

मामाकी,अलगसे कोई कमाई नही थी…अपने बाप की जायदाद बेच जो पैसा मिला, उसमे से उसने,अलग,अलग जायदाद,तथा share खरीदे…और वही उन सबका उदर निर्वाह बना..और खूब अच्छे-से…बेटा बाहर मुल्क में चला गया..तसनीम की माँ के बैंक लॉकर में जो गहने-सोना था, बहू ने बेच दिया…ससुर के घर में जो चांदी के बर्तन थे, धीरे,धीरे अपने घर लाती गयी…और परदेस की पर्यटन बाज़ी उसी में से चलती रही…

अब अगर मै कहूँ,कि, काश वो बद नसीब बच्ची नही बचती तो अच्छा होता,तो क्या ग़लत होगा? उसकी पढ़ाई तो हुई..क्योंकि,अन्यथा, मित्र गण क्या कहते? इस बात का डर तो मामा मामी को था..लेकिन पढाई के लिए पैसे तो उस बच्ची के नाना दे रहे थे! उस बच्ची को बारह वी के बाद सिंगापूर एयर लाइन की शिष्य वृत्ती मिली..उसे बताया ही नही गया..ये सोच कि,वहाँ न जाने क्या गुल खिलायेगी…! जो गुल उसने नही खिलाये, वो इनकी अपनी औलाद ने खिला दिए..इनकी अपनी बेटी ने क्या कुछ नही करतब दिखाए?

इन हालातों में तसनीम के पास आत्म हत्या के अलावा क्या पर्याय था? वो तो अपने भाई का घर बिखरने से बचाना चाह रही थी…! गर उसकी मानसिक हालत को लेके,उसके सगे सम्बन्धियों सही समय पे दक्षता दिखायी होती,तो ये सब नही होता…पर वो अपने पती के घर लौट जाय,यही सलाह उसे बार बार मिली…और अंत में उसने ईश्वर के घर जाना पसंद कर लिया…मजबूर होके!

उस बच्ची का अबतक तो ब्याह नही हुआ..आगे की कहानी क्या मोड़ लेगी नही पता..लेकिन इस कहानी को बयाँ किया..यही सोच,कि, क्यों एक औरत को हर हाल में समझौता कर लेने के लिए मजबूर किया जाता है? इस आत्महत्या को न मै कायरता समझती हूँ,ना गुनाह..हाँ,एक ज़ुल्म,एक हत्या ज़रूर समझती हूँ…ज़ुल्म उस बच्ची के प्रती भी…जिसने आज तलक अपना मुँह नही खोला..हर दर्द अंदरही अन्दर पी गयी…

एक उछाल

घटना दिसम्बर १९७६ की है। जमशेदपुर टेक्नीकल इंस्टीच्यूट में तकनीकी काम के प्रशिक्षण के साथ साथ मेरी पढ़ाई भी शुरु हो गयी थी। पढ़ाई का माध्यम अंग्रेजी था। मेरी उम्र करीब साढ़े सोलह साल की और मैं ठहरा गाँव का, जहाँ मातृभाषा (मैथिली) में ही विद्यालय के भी सारे काम निपटाने का चलन था। हिन्दी में बस लिखना पढ़ना भर था। अंग्रेजी के प्रति एक कठिन भाषा का अन्तर्बोध, क्योंकि ए, बी, सी, डी तक की भी पढ़ाई वर्ग छः से शुरु होती थी उन दिनों। जहाँ हिन्दी बोलने में भी दिक्कत हो वहाँ अंग्रेजी में पढ़ना, समझना और बोलना बहुत कठिन महसूस हो रहा था। ऊपर से मेरा स्वभाव बहुत संकोची और कम बोलने वाला था। लेकिन मजबूरी थी, पढ़ाई तो हर हाल में करनी थी आखिर जीवन यापन का प्रश्न जो सामने मुँह बाये खड़ा था।

खैर क्लास में शिक्षक आये और संक्षिप्त परिचय के बाद उन्होंने सारे प्रशिक्षणार्थियों को गणित का एक सवाल हल करने को दिया। मैंने भी सवाल को देखा और संयोग से उसे तत्काल हल कर दिया। लेकिन मुझे हिम्मत नहीं हो रही थी कि शिक्षक को दिखाऊँ। शहर के लड़कों का वेश-भूषा और तेज तर्रा बोल- चाल का मुझपर बहुत प्रभाव था और मैं अन्दर ही अन्दर समझता था कि ये लोग मुझसे हर मामले में आगे हैं। एक प्रकार की हीन भावना मेरे अन्दर महीनों से पल रही थी। यही कारण था कि मैं शिक्षक के सामने सही हल किये हुए सवाल के बावजूद भी खुद को प्रस्तुत नहीं कर पा रहा था और चुपचाप बैठा था। सारे लड़के कापी कलम पर भिड़े हुए थे और शिक्षक सबपर नजर रखे हुए क्लास में घूम रहे थे।

मुझे निष्क्रिय देखकर शिक्षक (श्री अशोक कुमार जी) महोदय ने टोका और झट से मेरे नजदीक आकर मेरी कापी देखने लगे। सही हल देखकर पूरे क्लास को संबोधित करते हुए बोले – देखो इस लड़के ने कितनी आसानी से सवाल को हल कर लिया और मुझे संबोधित करते हुए बोले – तुम आकर ब्लैक बोर्ड पर इसका हल करके सबको बताओ। डरते डरते मैं उठा और किसी तरह अधिक हिन्दी में बोलकर सवाल का हल बताया। शिक्षक महोदय ने सबके सामने मेरी खूब तारीफ की।

मुझे लगता है कि वह पल मेरे जीवन के लिए निर्णायक बन गया। शिक्षक द्वारा सार्वजनिक रूप से तारीफ होने पर मेरा हौसला बढ़ गया। मैंने भी मेहनत शुरू कर दी और जल्द ही टूटी फूटी अंग्रेजी में संवाद भी करने लगा। संकोची स्वाभाव लगातार दूर होता गया। प्रोत्साहन के उस उछाल ने मेरे जीवन की दिश दशा में परिवर्तन ला दिया। आजकल तो खूब बोलता हूँ और लोग कहते हैं कि अच्छा बोलता हूँ। सैकड़ों साहित्यिक मंचों का संचालन करने बाद भी जब जब मंच संचालन का या और किसी बिषय पर बोलने का अवसर मिलता है तो मुझे आदरणीय शिक्षक अशोक कुमार जी बहुत याद आते हैं। मैं आज भी उन्हें श्रद्धा से नमन करता हूँ।

चेतना के स्वर

सन १९७६ में मैट्रिक पास करते ही गरीबी के कारण आगे पढ़ना सम्भव नहीं था। अतः उसी साल जून महीने में टाटा स्टील द्वारा आयोजित अप्रेन्टिस की परीक्षा में शामिल हुआ और अंततोगत्वा सफल भी रहा। सितम्बर माह में वहाँ से सूचना मिली कि मुझे २९-०९-१९७६ को योगदान करना है।

२५-०९-१९७६ को मेरी तबियत बिगड़ गयी। माँ सहित सभी परिजन चिंतित थे। जोड़ तोड़ कर डाक्टर के फी लायक पैसे का जुगाड़ हुआ। डाक्टर की दवाई का असर द्रुतगति से हुआ और मैं ठीक हो गया। २७-०९-१९७६ को मुझे हर हाल में निकलना था। किसी नवीन जगह पर जाने के लिए भाड़े और प्रारंभिक खर्चे हेतु कम से कम १०० रूपये की जरूरत थी। घर में सब चिन्तित थे। जब कोई उपाय नहीं दिखा तो मेरी नयी नवेली भाभी बोली – लीजिए मेरा गहना गिरवी रख दीजिए। सबने मना किया तो भाभी बोलीं – मैं तो वैसा गहना बनाने की सोच रही हूँ जिसके बाद मेरे जीवन में गहने ही गहने होंगे तब इस गहना का क्या मोल? मुझे जब जब यह घटना याद आती है मैं द्रवित हो जाता हूँ और भाभी के प्रति श्रद्धा से नतमस्तक हो जाता हूँ। आज के परिवेश में सोचता हूँ तो यह बहुत बड़ी घटना लगती है। खैर–

उस साल कोसी का भी प्रकोप भयावह था। मुझे याद है कि बाढ़ का पानी रेलवे लाइन के बराबर बह रहा था। कौन ट्रेन चलेगी कौन नहीं? कहना किसी के लिए मुश्किल था। यहाँ तक कि रेलवे के स्टाफ भी कुछ बताने की स्थिति में नहीं थे। मुझे हर हाल में २८-०९-१९७६ के शाम तक भी जमशेदपुर पहुँचना था। मात्र १६ साल की उम्र गाँव से बाहर अकेला निकलने का यह पहला अवसर। मेरी मानसिक स्थिति कैसी होगी? आसानी से सोचा जा सकता है।

पूछ ताछ करते हुए किसी प्रकार क्यूल स्टेशन पहुँचा। वहाँ भी यही अफरा तफरी। जमशेदपुर के लिए सीधे कोई ट्रेन नहीं थी। बहुत भटकने के बाद पता चला कि पंजाब मेल आसनसोल तक जायगी फिर वहाँ से कोई पैसेंजर ट्रेन से अपने गन्तव्य तक पहुँचना संभव है। इसी बीच भीड़ में किसी ने कह दिया कि इस टिकट (जबकि एक्सप्रेस का टिकट था) के आधार पर पंजाब मेल से यात्रा नहीं किया जा सकता है। मैं महसूसता हूँ कि गरीबी के बालमन की शायद कुछ खास पीड़ा होती है। चिन्तित हो उठा ऊपर से समय पर ज्वाइन करने की विवशता। मुझे एक टी० टी० दिखाई दिया और तत्काल खयाल आया कि क्यों न इनसे पूछकर कन्फर्म कर लिया जाय और मैंने वही किया। सर – पंजाब मेल से जाने के लिए क्या यह टिकट उचित है? मुझे लगता है कि सरकारी महकमों का स्वाद चख चुके उस टी० टी० महोदय को यह समझते हुए देर नहीं लगी होगी कि अगला पप्पू (आजकल की भाषा में) है। ऊन्होंने प्रति प्रश्न किया कि – तुम आये हो किस ट्रेन से? मैंने ट्रेन का नाम बताया तो बोले चलो आफिस तुम गलत टिकट से आये हो। मैं क्षण भर के लिए अवाक हो गया फिर उन्हें अपनी मजबूरी बताई तो टी०टी० साहब बोले – तुरत पाँच रूपया निकालो। मैं भी बिना देर किए रुपये देकर अपनी जान बचायी। जाते जाते टी० टी० साहब बोले आधे घंटे में पंजाब मेल आ रही है, “अब तुम इस पर चढ़ सकते हो”। मन कुछ हल्का हुआ और ट्रेन का इन्तजार करने लगा।

कई प्रकार की चिन्ताओं और संवेदनाओं का बोझ लिए मुझे टी० टी० द्वारा कही यह बात नहीं जँच रही थी कि – “अब तुम पंजाब मेल से जा सकते हो”। उन दिनों पाँच रुपये का अपना महत्व था खासकर उस विकट परिस्थिति में मेरे लिए। साथ में भी तो कोई अपना नहीं था जिससे मन की बात कह पाता। मैं सोचने लगा कि अगर आगे किसी टी० टी० ने यही व्यवहार किया तो? मैं शंकाओं से भर गया। कुछ ही दूरी पर वही टी० टी० साहब मुझे दिखाई दिये। मैंने उनसे अपनी शंका बतायी तो उन्होंने कहा जाओ कोई नहीं पूछेगा। मैंने उनके वर्दी के ऊपर लगे नेम प्लेट को पढ़कर कहा कि – अगर कोई पूछेगा तो मैं कह दूँगा कि अवधेश कुमार सिंह ने मुझसे इस ट्रेन में चढ़ने हेतु रुपया ले लिया है। मेरे इतना कहते ही टी० टी० ने तत्काल अपने पाकेट से पाँच रुपया निकाल कर मुझे दे दिया। पता नहीं क्यों? वर्तमान हालात देखकर, आज भी उस “क्यों” का उत्तर खोज रहा हूँ।

वो एक दिन ..जिसने जिन्दगी बदल दी

जब इस मंच पर लिखने का निमंत्रण मिला तो समझ नहीं पाया की क्या किया जाए…कारण कुछ और नहीं…सिवाय इसके की ..पहले से ही बहुत से ब्लोगों पर भागीदारी की जिम्मेदारी है…और पूरी इमानदारी से यही कोशिश रहती है की….कभी ये आरोप न लगे की …बस खानापूर्ती हो रही है…मगर जब देखा की ये तो हमें अपने जीवन की पिछली यादों में झाँकने का अवसर दे रहा है…तो सच माने रहा नहीं गया…यूँ भी बीच बीच में अपनी मानव सुलभ मानसिकता के अनुसार यादों में अपने सुन्दर पलों को दोबारा जीने की इच्छा तो होती ही रहती है ….सो आ गए इस मंच पर उसे बांटने …मगर शुरुआत में ..लाख कोशिश के बावजूद ..उन पलों का ,,जिक्र नहीं कर सका ..जिन्हें मैं सुखद मानता हूँ…आज उस घटना का जिक्र ..जिसने मुझे एक दिन में ही मेरे बचपने से ..बालिग़ कर दिया..मैं एक बालक से अभिभावक बन गया….

कभी कभी कोई एक दिन ….कोई एक घटना ऐसी ..सबके जीवन में न सही ..मगर कुछ लोगों के जीवन में तो जरूर ही…घटती है तो उनके जीवन की पूरी दिशा बदल देती है…..लगभग बीस साल पहले…पिताजी नौकरी ख़त्म करके ..अवकाश प्राप्ति की योजनायें बनाते रहते थे…मेरी बड़ी बहन ..और उसकी शादी..बस एक ही सपना था ..जिसे वो तब पूरा करना चाहते थे…दिन रात उसीकी चिंता ..और बेटी यदि पढ़ी लिखी हो ..खूब पढ़ी लिखी हो तो उस समय तो ऐसा ही था की आपकी मुश्किलें ज्यादा बड़ी हैं..उसके काबिल लड़का तलाश करने के लिए..मगर पिताजी कभी भी ऐसी परिस्थितियों से घबराते नहीं थे…..हम (यानि हम दोनों भाई )इतने बड़े नहीं हुए थे…की उनकी चिंता को समझ भी पाते..बस इतना जरूर महसूस होता था …..की घर का माहौल कुछ ज्यादा ही गंभीर है …मगर सब कुछ अचानक ही थम गया..चिंता ,माहौल …..और जिन्दगी खुद भी…….

उस दिन की वो मनहूस सुबह ….कभी भी भुलाए नहीं भूलती..हमारे घर की धुरी ..रीढ़ की हड्डी ..हमारी दीदी ..अचानक एक दुर्घटना में ..हमें छोड़ कर चली गयी…माता जी बिलकुल टूट गयी …….और पिताजी मानसिक आघात से इतने लाचार हो गये ….कि बस सब मेरे ही कन्धों …पर आ पडा………उसी दिन शहर को छोड ….गांव पलायन हो गया…..गांव पहुंचे तो जो अपने ..थे न जाने क्या सोच कर बेगाने से हो गये ….शायद इस डर से कि …उनके नये ..हिस्सेदार आ गये …बहुत कम समय में ही ….सान्त्वना ने ..द्वेष का रूप ले लिया…..और मजबूर होकर मेरा बचपन…जैसा एकाएक …वयस्कता की दहलीज पर पहुँच गया….मासूमियत ..पहले आक्रोश फिर ..फिर धीरे धीरे ..उग्रता में बदल गयी…और मुझे लगा ..कि शायद उस वक्त अपने अभिभावकों का संरक्षक बनना..बेशक उस वक्त की तय नियति थी ….मगर उस समय जो जिम्मेदारी मेरे सर पर अचानक आ पड़ी..उसने मुझे आज तक ..जिस भी जगह पर मैं पहुँच पाया…ये उसी रास्ते की मंजिल की तरह था ….मगर इस बात की तकलीफ कभी कभी तो महसूस करता ही हूँ…कि यदि इस बात का भान पहले हो गया होता ..तो किंचित मैं ..अपना बचपन भरपूर जी लेता…..

उस एक दिन ने जिन्दगी की दिशा बदल दी थी…पारिवारिक हालातों से लेकर….आपस के रिश्ते तक ..और मेरे जीवन के सफ़र के रास्ते भी …..मगर उन हालातों ने निश्चय ही बहुत से सबक भी दे दिए…और यही था मेरी जिन्दगी के संस्मरण का पहला पन्ना …………