झारखंड समाचार

ए0पी0 सिंह जैसे कर्तव्यनिष्ठ

आईएएस हैं झारखंड में

झारखण्ड के कृषि, मत्स्य एवं पषुपालन विभाग के सचिव के रूप में अमरेन्द्र प्रताप सिंह के योगदान देने के पश्‍चात से इस विभाग में एक नये कार्यसंस्कृति का सृजन हुआ है। गौरतलब हो कि श्री सिंह राज्य में कर्तव्यनिष्ठ व अनुशासनप्रिय भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी के रूप में काफी लोकप्रिय हैं।

1991 बैच के अधिकारी श्री सिंह के पास प्रशासनिक दक्षता का एक लम्बा अनुभव है, जिसके फलस्वरूप श्री सिंह के कृषि विभाग में योगदान देने के पश्‍चात से राज्य में भीषण सुखाड़ की परिस्थिति में इन्होने केन्द्र के द्वारा दिल्ली में आयोजित बैठक में कृषि सचिव के रूप में उपस्थित होकर श्री सिंह ने झारखण्ड राज्य के हालात पर जो जानकारी दी उसके फलस्वरूप केन्द्र ने भी सार्थक पहल करते हुए इस राज्य की सुधि ली। यही नहीं श्री सिंह मत्स्य व पषुपालन विभाग में भी कार्य संस्कृति को यथासंभव सुधार कर यहां एक स्वस्‍थ्‍य कार्यप्रणाली का सृजन किया है। श्री सिंह का मानना है कि राज्य में बेहतर कृषि की पूर्ण संभावना है इसके लिए व्यापक प्रयास भी किये जा रहे हैं तथा राज्य कृषि आधारित प्रदे हो इसके लिए मूल भुत प्रक्रिया के साथ-साथ कारगर प्रयास भी निरंतर जारी है।

विदित हो कि श्री सिंह भारतीय प्रशासनिक अधिकारी के रूप में पश्चिम सिंहभूम, बोकारो, गिरीडीह, गढ़वा, हजारीबाग में उपायुक्त रह चुके हैं, जब उनकी पदोन्नति हुयी तो उन्हे संथाल परंगना का आयुक्त बनाया गया। श्री सिंह आयुक्त के रूप में भी संथाल परगना में काफी कम समय में ही द्रूत गति से कार्यो का संपादन किया जिसके फलस्वरूप श्री सिंह संथाल परंगना में लोकप्रिय आयुक्त की संज्ञा पाने में सफल रहे थे। इनकी बेहतर कार्य प्रणाली व कार्यदक्षता को देखते हुए सरकार ने इन्हें भवन निर्माण विभाग का सचिव बनाने के साथ-साथ इन्हें परिवहन विभाग के सचिव का अतिरिक्त प्रभार भी सौंपा था। वर्तमान समय में श्री सिंह अपने अधीनस्थ विभाग को न सिर्फ दुरूस्त करने में सफल हुये हैं, बल्कि विभागीय कार्यो का निष्पादन व विभागीय कार्य यथाशीघ्र संपन्न कर रहे हैं। श्री सिंह का मानना है कि विभाग के अधीन जितने भी कार्य संपादित हो रहे हैं उनमें पारदर्श‍िता के साथ-साथ कार्य के प्रति गम्भीरता बरती जाय जिससे कि कार्यो में किसी प्रकार की शिथिलता न हो।

विनय मिश्र

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झारखंड समाचार

फाइलें दौड़ रही हैं,

विचारों की अभिव्यक्ति पर किसी तरह की कोई पाबंदी नहीं होती। लोग अपनी तरह से विचार व्यक्त करते रहते हैं। अब झारखंड के पूर्व राज्यपाल के क्रियाकलापों पर अपने विचार व्यक्त करते हुए लोग कहते थे कि राज्यपाल महोदय पूर्व के मंत्रियों की तरह उगाही में लगे थे और मंत्रियों की तरह झारखंड को लूटा। उन्होंने पूर्व की तरह ट्रांस्फर पोस्टिंग उद्योग को बरकरार रखा। अब कारण चाहे जो भी हो, पर रजी साहब विदा हो गये हैं और नये राज्यपाल के.शंकरनारायणन आये तो कहा जाने लगा कि ये झारखंड में कांग्रेस के प्रतिनिधि बन कर आये हैं और चुनाव में कांग्रेस को जीत दिलाने के लिए केन्द्र से भेजे गये हैं। इन विवादों या दलीलों में जाने से बेहतर है कि विदा होते रजी और स्वागत शंकरनारायणन के समय को देखें, जिसमें झारखंड के मगरमच्छों को जाल में फंसाया गया। उस जाल मं इन मगरमच्छों के करोड़ों की सम्पत्ति, अनेक जमीन-जायदाद फंसे।

आम लोगांे ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि एक दो मगरमच्छों से क्या झारखंड के तालाब में तो मगरमच्छों की भरमार है। दो-चार से क्या होने वाला। चलो संतोष यह है कि ऊँट के मुह में जीरा ही सही। झारखंड के मंत्री अरबपति और अफसर करोड़पति है।

नये राज्यपाल महोदय आये तो झारखंड में उन्हें सूखा और उग्रवाद ने स्वागत किया। सूखे से निपटने के लिए ग्रामीण स्तर पर उन्होंने आपाधापी में दो कार्य आरंभ किये। पहले कि आंगनवाड़ी सेविका की बहाली युद्ध स्तर पर करने के आदेश दिये। आदेश फैक्स के जरिये उपायुक्त तक पहुंचा। उपायुक्त के होश उड़ गये। वे नपना नहीं चाहते थे, सो दौड़ा दिये अपने माहततों को। आदेश दिया कि अब चाहे जैसे भी हो, जिस तरह हो, घर बैठे या फिल्ड में जाकर, तुरंत बहाली कर जानकारी दें। नहीं, तो नप जायेंगे। अनुमंडल अधिकारी देर रात तक जग कर आनन-फानन में बहाली कर डाले। इस आपाधापी में 10-5 इधर-उधर हो भी गये हों, तो दोष किसी का नहीं हो सकता। समय का हो सकता है। जो कार्य वर्ष में नहीं कर सकी, वो कार्य राज्यपाल महोदय ने महीनों में नहीं, बल्कि दिनों कर दिखाया। धन्यवाद! के पात्र हैं राज्यपाल महोदय। काम कैसे नहीं हो सकता या काम कैसे होता है, कर दिखला दिया। इन आंगनबाड़ी सेविकाओं का दायित्व है कि कार्य को जिम्मेदारी से निभायें। अब राज्यपाल महोदय गाँव-गाँव, घर-घर घूम कर काम करने तो नहीं जायेंगे।

यदि ईमानदारी से काम करे, तो ग्राम का निश्चय ही भाग्योदय हो जायेगा।

दूसरा काम राज्यपाल महोदय ने किया कि 1000 की आबादी पर एक-एक राशन दुकान खोलने के लिए आनन-फानन में लाइसेंस देने का निर्णय लिया गया। वह लाइसेंस भी महिलाओं के स्वयंसहायता समूह को दिया गया। इस निर्णय के पीछे गाँव-गाँव में राशन की उपलब्धता सुनिश्चित कराना था। इसमें भी उपायुक्त, अंचलाधिकारी से लेकर प्रखंड के कर्मचारी तक गाँव-गाँव में जाकर स्वयं सहायता समूह से विनती करने लगे कि दीदी-बहना, तुम राशन दुकान का लाइसेंस ले लो। कोई पूछती कि कैसे करना है। क्या हमलोगों को राशन लाने के लिए दौड़ना पडे़गा। क्या हमलोगों को भी सप्लाई विभाग के अफसरों, इंस्पेक्टरों से पाला पड़ेगा। कितना फायदा होगा। तो कोई पूछती कि कितना पैसा लगेगा, तो कर्मचारी बोलते कि बहना हमको कुछ नहीं मालूम। तुम जल्दी से लाइसेंस ले लो। यह सब हमकों नहीं मालूम। धीरे-धीरे पता चल जायेगा। भले बाद में बंद कर देना पर अभी ले लो, नहीं तो हम नप जायेंगे।

लाइसेंस लेने में जरूरी कागजात कुछ 19-20 था, उसे जल्दीबाजी में दुरूस्त कर लिया गया। आनन-फानन में लाइसेंस मिल गया। सोचने का यह भी है कि यही अफसर, यही कर्मचारी कैसे आनन-फानन में रात-दिन एक करके आदेश का पालन कर रहे हैं और यही कर्मचारी मंत्रियों के आदेश को डस्टबीन में फेंक देते थे। एक राज्यपाल से जितना डर लग रहा है, वे इतने मंत्रियों और अफसरों से क्यांे नहीं डरते थे। जाहिर है, उस वक्त सभी एक टेबल पर बैठकर रसमलाई खा रहे थे, तो फिर डर कैसा और किसका डर? महिला समूहों को राशन दुकान का लाइसेंस देने के पीछे मकसद यही था कि अभी तक राशन डीलर गाँव तक राशन पहुँचाते ही नहीं, बल्कि उनका ब्लैक शहरों में ही कर देते थे, उनसे उन्हें निजात दिलाना था।

गाँव-गाँव में राशन दुकान होने के कारण और खास कर महिला समूहों के हाथों में डीलरशीप होने के कारण गाँव-गाँव में राशन पहुँच तक तो पायेगा। सही वितरण हो पायेगा। दूर-दराज के गाँवों में गरीब से गरीब तक अनाज पहुँच पायेगा। दोनो ही कार्यक्रमों के विचार नेक है। सामाजिक है, पर इनका क्रियान्वयन कैसे हो पायेगा? इनकी सफलता के पीछे यही एक यक्ष प्रश्न है।

योजनाएँ सारी अच्छी होती हैं। दोष उनके क्रियान्वयन में होता है। क्रियान्वयन सही ढंग से नहीं हो पाता। जिस राज्य में पगार, बकाया पगार, पेंशन तक लेने के लिए अपने ही भाई-बंधु को रिश्वत देने पड़ते हैं। उस राज्य में यह कैसे मान लिया जाए कि फाइलें तेजी से बढ़ेगी। राज्यपाल महोदय को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि राशन दुकान जो खुले हैं, उन तक समय पर बिना रिश्वत दिये राशन पहुँचे। उनका सही प्रकार से वितरण हो। यह भी देखना है कि आंगनबाड़ी सेविका को जिम्मेदार और जिम्मेवार कैसे बनाया जाए। राज्यपाल महोदय को यह भी देखना है कि बड़े-बड़े मगरमच्छ, जो आदमी को जिन्दा निगल कर गहरे पानी में डूबकी लगा कर बैठ हैं, उन्हें कैसे जाल में फंसाया जाए। अभी तो सूर्योदय की बेला है। देखना है, दोपहर होते-होेते राज्यपाल महोदय क्या कर पाते हैं। दोपहर बाद न जाने सत्ता किसके हाथ जाए!

विजय रंजन

न्याय कैसे मिलेगा?

झारखंड हाईकोर्ट के न्यायाधीश प्रंशात कुमार के चेम्बर में हाईकोर्ट का ही एक चपरासी शत्रुघन राम चाकू लेकर घूस गया। उसका बेटा नीलकंठ सागर सितम्बर 2008 से लापता है. कई बार एस.पी व न्यायाधीश को वह आवेदन दे चुका है, पर शत्रुघन राम का कहना है कि किसी ने कुछ नहीं किया. पुलिस व मीडिया ने भी कुछ नहीं किया. उसने कहा, ‘समय-समय पर उसे बेटे से बातचीत भी कराई जाती है’. उसने कहा कि इसीलिए योजना बनाई कि जज को चाकू दिखाने से मीडिया में इसका कवरेज होगा और इससे उसका उद्देश्य पूरा हो जाएगा. हाईकोर्ट कर्मियों ने बताया कि बेटे के लापता होने के बाद शत्रुघन का मानसिक संतुलन बिगड़ गया है. प्रथम दृष्टया में, तो यह एक मामूली सी घटना ही मालुम होती है और इसे इसी रूप में लिया भी गया. परन्तु देश की वर्तमान स्थिति देखने के बाद और इस तरह की घटित बहुत सारी घटनाओं को उससे जोड़ते हुए यदि इस घटना के तह में जाकर वैचारिक झंझावतों से एक संतुलित लहर को खींच कर निष्पक्षता पूर्वक दृष्टिपात किया जाए, तो देश की अनेक समस्याओं की परत दर परत खोली जा सकती है और सही एवं सुचारू ढंग से इनके समाधान करने में सहायता प्राप्त की जा सकती है. आज देश में पूरी तरह पावर गेम चल रहा है. अर्थात जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहावत चरितार्थ हो रही है. गरीबो, शोषितों, मजबूरों को कोई पूछने वाला नहीं है. जिसके पास ताकत है चाहे वह किसी रूप में हो, उसी की पूछ हो रही है. कमजोरों को सतया जा रहा है. उन्हें न्याय नहीं मिल रहा है. यह यदि मिल भी रहा है, तो उसके स्वरूप पर प्रश्नचिन्ह लग रहे हैं. साथ ही साथ उसमें इतनी देर हो रही है कि उस न्याय की सार्थकता ही खत्म हो जाती है. कुछ ही दिनों पहले झारखंड के दौरे पर आये सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश श्री बालाकृष्णन ने कहा था कि झारखंड में अधिकतर मामले (केस) गरीबों पर किये जाते हैं. इन सब बातों से पता चलता है कि हमारी सरकार की कार्य प्रणाली आम लोगों के लिए कितनी प्रतिकूल साबित हो रही है कि न्याय के आलय अर्थात न्यायालय के छोटे स्तर के कर्चचारी के द्वारा न्याय की मूर्ति अर्थात् न्यायमूर्ति को चाकू दिखाने की घटना असाधारण तो है ही, पर उससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि आखिर ऐसी स्थिति आई ही क्यों? क्यों उस चपरासी को लोगों व मीडिया अथवा सरकार का ध्यान आकृष्ट करने के लिए हथियार (चाकू) का प्रदर्शन करना पड़ा. जैसा कि उसने कहा उससे स्पष्ट है कि उसकी बात नहीं सुनी जा रही थी. या अगर कार्यवाई की भी जा रही थी, तो इतनी धीमी गति से की जा रही थी कि न्यायालय कर्मी ने अपना धर्य खो दिया. यहाँ कर्मचारी को छोटे स्तर का उद्धृत करने का तात्पर्य यह है कि छोटे लोगों की बातो पर प्रायः ध्यान नहीं दिया जाता. चपरासी या हो जज दोनों सरकार के कर्मचारी है, पर क्या किसी जज अथवा उस उच्चाधिकारी के पुत्र के लापता होने के इतने दिनों बाद भी ऐसी उदासिनता की स्थिति ही होती? निश्चित रूप से नहीं! लेकिन इसी गरीब और छोटे स्तर के लोगांे के विषय की बात जो हमारे समाज की मानसिकता में बैठ गयी है, उससे अनेक सामाजिक परेशानियाँ उत्पन्न हो रही हैं. न्यायालय के कर्मचारी (चपरासी) के द्वारा कहे गये इस बात की उसने जज को चाकू दिखाने की योजना इस लिए बनाई थी कि मीडिया और लोगों का ध्यान उसकी अर्थात् उसकी समस्या की ओर आकृष्ट हो ताकि उसका समाधान निकल सके, पर भी एक अलग दृष्टिकोण से ध्यान देने की आवश्यकता है. यह करीब करीब ठीक वैसी ही बात है, जैसा अनेक उग्रवादी, आतंकवादी संगठनों के लोगों ने कई बार कहा कि उन्होंने इसलिए हथियार उठाया कि उनकी बात सुनने वाला कोई नहीं था. और उन्हें न्याय नहीं मिल रहा था. या फिर उन्हंे निष्पक्ष न्याय की उमीद ही नहीं थी. देश में अनेक लोगों ने गरीबी, शोषण एवं अन्याय से तंग आकर हथियार उठाया है. यदि इस घटना के पहलू के वैचारिक कसौटी को थोड़ी उदारता प्रदान कर इसमें ढील दी जाए, तो यह कहा जा सकता है कि स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद, राजगुरु, खुदी राम बोस, अशफाकुल्ला आदि ने भी कुछ ऐसी ही परिस्थिति के अन्तर्गत हथियार उठाया होगा. अंग्र्रेजी सरकार ने भी उनके समक्ष कुछ-कुछ वैसी ही स्थिति पैदा कर दी होगी, जैसी स्थिति कुछ मामलों में आज उत्पन्न हो गयी है. इस घटना के एक दूसरे महत्वपूर्ण पहलू पर भी गंभीरतापूर्वक ध्यान देने की आवश्यकता है. और यह है कि जैसा कि समाचारों में आया कि चपरासी को पकड़ कर पुलिसकर्मियों के द्वारा पीटा गया और उसे थाने भेज दिया गया. तथा बाद में अस्पताल भेज दिया गया. ड्यूटी में लापरवाही बरतने के आरोप में तीन कर्मियों को भी निलंबित कर दिया गया. बताया गया कि शत्रुघन राम की मानसिक स्थिति बिगड़ गई है. इतना भर कर देने से क्या सरकार व समाज के कर्तव्य की पूर्ति हो जाती है? हो सकता है कि सचमूच वह कर्मचारी विक्षिप्त हो या मानसिक रूप से बीमार, परेशान हो, पर सिर्फ उसे बीमार या विक्षिप्त मान लेने भर से समस्या का समाधान नहीं हो सकता. किसी को केवल विक्षिप्त मानकर उसकी एवं उसकी समस्याओं की उपेक्षा करना उचित नहीं है. यह एक बड़ी भूल होगी इसी भूल ने अनेक वर्षों से हमारे मानसिक ढांचे को लचर बना दिया है. यह नहीं है कि कोई व्यक्ति मानसिक रूप से सामान्य है या असामान्य, बल्कि अहम् मुद्दा यह है कि ऐसी व्यवस्था, अवस्था अथवा स्थिति ही क्यों उसके सामने आई या लाई गयी कि उसे ऐसी हरकत करनी पड़ी? यदि असमान्य व्यक्ति भी कोई सही बात कहता है, तो उस बात को महत्व देने की आवश्यकता है, वजाए इसके कि हम व्यक्ति विशेष की मानसिक अवस्था समान्य या असमान्य पर बहस करें यदि आग से कोई जल रहा है और कोई असमान्य व्यक्ति यह कहे कि अमुक व्यक्ति आग से जल रहा है, तो हमें पहले उस व्यक्ति के आग लगने की सत्यता को परख कर उसे बूझाने का काम करना चाहिए वजाए इसके कि बिना जाँचे परखे यह कह दिया जाए कि अरे वह, तो असमान्य व्यक्ति है उसकी बातों का क्या महत्व, परन्तु आज दुर्भाग्यवश समाज में यही हो रहा है. लोगों को सरोकार आम लोगों से जुड़े सामाजिक मुद्दों को ठीक करने से होना चाहिए विक्षिप्त व्यक्ति भी यदि कोई ऐसी बात कह रहा है या कहना चाहता है कि जिससे समाज के लोगों का भला हो, तो उस व्यक्ति की मानसिक अवस्था के वजाए उस बात को महत्व देने की आवश्यकता है. ऐसा कर भविष्य में अनेेक लोगों को कुंठाग्रस्त और निराश होने से भी बचाया जा सकता है.
कुमार एजाज सैम

गोइलकेरा में नक्सली हिंसा: 10 जवान मरे


 देश के कई हिस्से मंे नक्सली हिंसा रोज व रोज हो रहे हैं, निर्दोष लोग मारे जाते हैं. पुलिस कर्मी मारे जाते हैं, नेता मारे जाते हैं. लेकिन नक्सली हिंसा का समाधान सरकार के पास नहीं है. नक्सली उन्मूलन के लिए हजारों करोड़ रुपए स्वाहा हो जाते हंैं. परिणाम कुछ भी नहीं निकलता. 
पिछले दिनों 10 जून 2009 को पश्चिम सिंहभूम जिले के गोइलकेरा थाना क्षेत्र में सारूगड़ा व औरंगा के बीच हुई नक्सलियों ने10 जवान को मार कर घटना को अंजाम दिया, तथा ठीक इसके चैथे दिन बाद बोकारो के बेरमों अनुमंडल के नावाडीह के पास सारूबेरा मुख्य पथ पर मावोवादियों ने बारूदी सुरंग विस्फोट कर 11 जवान को मार डाला. 
 हर बार की तरह इस बार भी नक्सलियों ने सरकार को चुनौती दी. सरकार हर बार की भांति इस बार भी कुछ पुलिस अधिकारियों का तबादला तबादला कर अपने कत्र्तव्यों का इतिश्री मान ली है. 
 पष्चिम सिंहभूम जिला में यह नियती हो गयी है कि उग्रवादी घटना के पष्चात तत्कालीन आरक्षी अधीक्षक का तबादला कर बड़ी कार्रवाई मान ली जाती है.  10 जुन को गोईलकेरा प्रखण्ड अन्तर्गत चितिर में उग्रवादी के द्वारा लैंड माईंस बिस्फोट कर दस पुलिसकर्मियों की हत्या के पष्चात पष्चिम सिंहभूम के आरक्षी अधीक्षक सुधीर कुमार झा का तबादला भी संभवतः इसी की एक कड़ी है. गौरतलब हो कि इससे पूर्व वर्ष 2002 में विटकीलसोय में उग्रवादियों के द्वारा कई पुलिसकर्मियों को मारने के पष्चात तत्कालीन आरक्षी अधीक्षक मनोज कुमार मिश्र का तबादला कर दिया गया तथा उनके स्थान पर प्रवीण कुमार सिंह को नया पुलिस अधीक्षक बनाया गया था. पुनः एक बार उग्रवादियों ने पुलिस पर अपना दबदबा प्रदर्षित करते हुए बालिवा में भी कई पुलिसकर्मियों को मौत की नींद सुला दिया तथा इस मुठभेड़ में एस0पी0 भी घायल हो गये थे. इसके बाद अनिल पालटा को इस जिले का कमान सौंपा गया. इस जिला में सर्वाधिक समय तक पुलिस कप्तान के रूप में सुधीर कुमार झा ने पष्चिम सिंहभूम जिला में 16.12.06 को योगदान दिया तथा उस समय से लगभग 30 महीने तक इस जिले में सघन अभियान चला कर अपनी लोकप्रियता स्थापित की थी तथा हेल्प लाईन, पुलिस व आम नागरिकों के बीच मधुर संबंध बनाने, उग्रवाद प्रभावित क्षेत्र के बेरोजगार युवकों को रोजगार मुहैया कराने, मानकी – मुण्डाओं के साथ पुलिस के आपसी तालमेल बेहतर बनाने में भी श्री झा की अहम भूमिका रही । यही नहीं पुलिस कप्तान के रूप में श्री झा ने जनता दरबार कार्यक्रम में प्रषासन के द्वारा लगाये जाने वाले राहत षिविर में भी अपनी सक्रिय भूमिका निभाकर पुलिस को काफी लोकप्रिय बनाया था. पुलिस व आम लोगों के बीच जितना प्रगाढ़ संबंध बनाने के लिए श्री झा के द्वारा गम्भीर पहल किया गया वह अपने आप में एक उपलब्धि ही मानी जायेगी । श्री झा के द्वारा अपराध नियंत्रण के लिए उठाये गये कदम भी काफी कारगर सिद्ध रहे. ग्रामीण क्षेत्र के लोग पुलिस को जानकारी देने के लिए स्वंय सार्थक पहल भी किया करते थे तथा श्री झा योगदान देने के पष्चात से तत्कालीन उपायुक्त रविशंकर वर्मा के साथ स्वंय जनता दरबार कार्यक्रम में षिरकत कर पुलिस की छवि को काफी लोकप्रिय बनाया था. इसके पष्चात एम0पी0 सिंहा एवं वर्तमान उपायुक्त सुनील कुमार के साथ भी बेहतर ताल-मेल कर इस जिले में पुलिस व प्रषासन के बीच तालमेल का नायाब उदाहरण प्रस्तुत किया था. सरकारी नौकरी में तबादला सामान्य प्रक्रिया है किन्तु पुलिस कप्तान के अपने बेहतर 29 महीने के सफलता पूर्वक कार्यकाल के दौरान उग्रवादियों के द्वारा इस घटना को अंजाम दिये जाने से आरक्षी अधीक्षक भी स्वंय व्यथित हुये तथा किन्तु उनका मनोबल काफी ऊॅचा रहा जिसके फलस्वरूप पुलिस कप्तान स्वंय घटना स्थल पर पहुंच कर मोरचा का सफलता पूर्वक नेतृत्व भी किया. जिसके फलस्वरूप उग्रवादियों को पीछे हटना पड़ा था. कुल मिला कर यह कहा जा सकता है कि आरक्षी अधीक्षक के रूप में सुधीर कुमार झा इस जिला के लिए काफी कुषल पुलिस कप्तान साबित हुये तथा इनके तबादले से निष्चित तौर पर नये आरक्षी अधीक्षक को पुलिस व पब्लिक के बीच बेहतर संबंध बनाने के लिए सार्थक पहल करने होंगे. 
विनय कुमार मिश्र

धोनी को मिलेगा प्रतिबंधित पिस्टल लाइसेंस

धोनी को मिलेगा प्रतिबंधित पिस्टल लाइसेंस. टीम इंडिया के कप्तान महेन्द्र सिंह धौनी का प्रतिबंधित पिस्टल लाइसेंस बन कर तैयार हो गया है, लेकिन उनके हस्ताक्षर का प्रशासन को इंतजार है। उपायुक्त राजीव अरुण एक्का के अनुसार धोनी के आवेदन को उसके परिजनों द्वारा हस्ताक्षर के लिए मुम्बई भेजा गया है. अब धोनी के हस्ताक्षरयुक्त आवेदन फिर से जिला प्रशासन को मिलने के बाद ही लाइसेंस निर्गत किया जायेगा. फिलहाल धोनी इंग्लैंड में व्यस्त हैं. विदित हो कि पिछले वर्ष अगस्त माह में धेनी ने आत्म रक्षार्थ नाईन एमएम पिस्टल लाइसेंस के लिए आवेदन दिया था. इस मामले में जिला प्रशासन की लेट लतीफी और अडंगेवाजी के बाद मीडिया ने पहल की थी. अखबारों की सुिर्खयों में मामले के चढ़ जाने के बाद तत्कालीन एसडीओ मनोज प्रसाद ने उपायुक्त को आवेदन अग्रसारित कर दिया था. इसके बाद भी उपायुक्त और आयुक्त के कार्यालयों में जाकर आवेदन काफी दिनों तक लिम्बत रहा. आयुक्त ने उस वक्त धोनी के आवेदन को यह कहते हुए वापस कर दिया था कि इसकी निगरानी, सीआईडी व विशेष शाखा से स्वच्छाता प्रमाण-पत्र लेना आवश्यक है, जबकि वीवीआइपी के मामले में उक्त प्रावधान नहीं है. केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने प्रतिबंधित लाइसेंस निर्गत करने का हवाला देते हुए सूबे के गृह मंत्रालय को निर्देश जारी किया था. तब तक तमाड़ उप चुनाव की घोषणा हो चुकी थी. आचार संहिता लगने के कारण तीन महीने तक इस मामले की संचिका आयुक्त कार्यालय में पड़ी रही. बाद में राज्य के गृह सचिव ने वीवीआइपी प्रतिबंधित लाइसेंस की अनुशंसा करते हुए दोबारा जाँच प्रतिवेदन सौंपने की सलाह दी. इसी के आलोक में पुन: संचिका एसडीओ से लेकर आयुक्त कार्यालय भेजा गया.तत्कालीन आयुक्त शीला किस्कू रपाज ने प्रतिबंधित लाइसेंस के मामले में जब प्रतिकूल टिप्पणी की, तो फिर से एक बार मामला मीडिया में छा गया. राज्य सरकार की थू थू के बाद फिर केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने एक निर्देश जारी किया. लेकिन आम चुनाव की घोषणा होने के बाद फिर से तीन माह तक संचिका को आचार संहिता के कारण बंद कर दी गई.ट्वेन्टी-20 वल्र्ड कप खेलने इंग्लैंण्ड रवाना होने के पूर्व धोनी को प्रशासन ने जल्द ही लाइसेंस निर्गत करने का भरोसा दिलाया था.

उदय चौहान

धोनी को मिलेगा प्रतिबंधित पिस्टल लाइसेंस

टीम इंडिया के कप्तान महेन्द्र सिंह धौनी का प्रतिबंधित पिस्टल लाइसेंस बन कर तैयार हो गया है, लेकिन उनके हस्ताक्षर का प्रशासन को इंतजार है. उपायुक्त राजीव अरुण एक्का के अनुसार धोनी के आवेदन को उसके परिजनों द्वारा हस्ताक्षर के लिए मुम्बई भेजा गया है. अब धोनी के हस्ताक्षरयुक्त आवेदन फिर से जिला प्रशासन को मिलने के बाद ही लाइसेंस निर्गत किया जायेगा. फिलहाल धोनी इंग्लैंड में व्यस्त हैं. विदित हो कि पिछले वर्ष अगस्त माह में धेनी ने आत्म रक्षार्थ नाईन एमएम पिस्टल लाइसेंस के लिए आवेदन दिया था. इस मामले में जिला प्रशासन की लेट लतीफी और अडंगेवाजी के बाद मीडिया ने पहल की थी. अखबारों की सुिर्खयों में मामले के चढ़ जाने के बाद तत्कालीन एसडीओ मनोज प्रसाद ने उपायुक्त को आवेदन अग्रसारित कर दिया था. इसके बाद भी उपायुक्त और आयुक्त के कार्यालयों में जाकर आवेदन काफी दिनों तक लिम्बत रहा. आयुक्त ने उस वक्त धोनी के आवेदन को यह कहते हुए वापस कर दिया था कि इसकी निगरानी, सीआईडी व विशेष शाखा से स्वच्छाता प्रमाण-पत्र लेना आवश्यक है, जबकि वीवीआइपी के मामले में उक्त प्रावधान नहीं है. केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने प्रतिबंधित लाइसेंस निर्गत करने का हवाला देते हुए सूबे के गृह मंत्रालय को निर्देश जारी किया था. तब तक तमाड़ उप चुनाव की घोषणा हो चुकी थी. आचार संहिता लगने के कारण तीन महीने तक इस मामले की संचिका आयुक्त कार्यालय में पड़ी रही. बाद में राज्य के गृह सचिव ने वीवीआइपी प्रतिबंधित लाइसेंस की अनुशंसा करते हुए दोबारा जाँच प्रतिवेदन सौंपने की सलाह दी. इसी के आलोक में पुन: संचिका एसडीओ से लेकर आयुक्त कार्यालय भेजा गया।तत्कालीन आयुक्त शीला किस्कू रपाज ने प्रतिबंधित लाइसेंस के मामले में जब प्रतिकूल टिप्पणी की, तो फिर से एक बार मामला मीडिया में छा गया. राज्य सरकार की थू थू के बाद फिर केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने एक निर्देश जारी किया. लेकिन आम चुनाव की घोषणा होने के बाद फिर से तीन माह तक संचिका को आचार संहिता के कारण बंद कर दी गई.ट्वेन्टी-20 वल्र्ड कप खेलने इंग्लैंण्ड रवाना होने के पूर्व धोनी को प्रशासन ने जल्द ही लाइसेंस निर्गत करने का भरोसा दिलाया था.

उदय चौहान

मनचलियों का मन बहलाने का फोन नम्बर है 101

यदि आप आशिक मिजाज, दिलफेक आशिक हैं या मजनूओं की लाइन में सहर्ष खड़े होना चाहते हैं, तो समझ लीजिए आपके इंतजार की घड़ियाँ खत्म हो गईं. जी हाँ नहाधोकर सुन्दर कपड़े पहन कर क्रीम-पाउडर लगाकर पहँुच जाइए राँची के आड्रे हाउस स्थित एवं नेपाल हाउस स्थित फायर ब्रिगेड (आग बुझाने का कार्यालय) आफिस वहाँ पर फोन नम्बर 101 के पास बैठ जाइए और फायर ब्रिगेड के कर्मचारियों से थोड़ी विनती कीजिए यदि वे आप पर तरस खाकर आप पर मेहरवान हो गये, तो समझिए आपके वारे-न्यारे हो गये. बस 101 नम्बर के फोन की घंटियाँ बजते ही उसे आप उठा ले. फिर मजे ही मजे हैं. आप को दूसरी ओर से मदमस्त करने वाली खनकती हुई आवाजें सुनाई देंगी. मनचली लड़कियों एवं लड़कों की जो आपके कान में अपने मधुर-मधुर स्वरों का रस घोलेंगे. अब यह आप पर निर्भर करता है कि आप उन लड़के, लड़कियों से दोस्ती करेंगे या उनके साथ कैसा व्यवहार करेंगे. यदि आप फोन करने वाली मनचलियों और मनचलों से दोस्ती करना चाहेंगे, तो बात आगे भी बढ़ सकती हैं. और यदि आप उनके रस भरे वार्तालाप अथवा अश्लील बातों का विरोध करेंगे, तो आप को भद्दी-भद्दी गालियाँ भी मिलेंगी. प्रायः 101 नम्बर पर लोग शहर, गाँव, महल्लों, घरों आदि में आग लग जाने पर सहायता के लिए फोन करतें हैं. और सूचना मिलते ही फायर ब्रिगेड के जाँबाज सिपाही अपनी जान पर खेल कर दमकल के साथ निकल पड़ते हैं आग बुझाने के लिए. और साहस और सूझ-बूझ के साथ आग पर काबू पाने की कोशिश करते हैं. अक्सर इनकी कोशिशों एवं कर्तव्यों की वजह से बड़े-बड़े हादसों को टाला जाता है. पर बड़े ही दुख की बात है कि ऐसे कर्तव्यनिष्ट ईमानदार अग्निशामक कर्मचारियों के दिलों में कुछ मनचलें युवक, युवतियाँ अपनी दिल्लगी और चूहलबाजियों की खातिर आग लगा रहे हैं. ऐसे गैर जिम्मेदार युवकों एवं युवतियों की खातिर फायर ब्रिगेड के कर्मचारियों को बेवजह मानसिक पीड़ा झेलनी पड़ती है. वे बेचारे चाह कर 101 नम्बर के फोन के काॅल नजरअंदाज नहीं सकते कि क्या पता कहीं किसी जरूरतमंद का ही फोन हो. उन्हें101 नम्बर को उठाना ही पड़ता है और वे बेचारे बेवजह पड़ेशान होते हैं. ज्ञातव्य है कि पुरे देश में 101 नम्बर फायर ब्रिगेड के लिए आवंटित है, जो कि एक टोल फ्री नम्बर है अर्थात् इस नम्बर पर फोन करने से कोई शुल्क नहीं लगता है. इसी का लाभ हमारे तथाकथित शिक्षित समाज के कुछ बिगडै़ल आवारा बदमिजाज लोग उठाते हैं और यहाँ अश्लील बातें करते हैं. यदि फायर ब्रिगेड के कर्मचारी इनका प्रतिकार करते हैं, तो ऐसे बदमाश युवक उनको भद्दी-भद्दी गालियाँ देने से भी नहीं हिचकते. ऐसे मनचले युवक-युवतियों के फोन सुबह से लेकर देर रात तक किसी भी समय आ सकते हैं. बेशर्मी और बेहयाई से भरी इनकी बातें होती हैं. लड़कियों के फोन प्रायः देर रात में अधिक आते हैं, जिनकी बातें भी अश्लील होती हैं. ये बाते आश्चर्यजनक हैं, पर सत्य हैं. ऐसी घटनाएँ हमारे समाज की गिरती मानसिकता की द्योतक हों या फिर पश्चिमी सम्यता की अंधी नकल पर इनसे समाज की नैतिकता पर प्रश्नचिन्ह तो लगता ही है साथ ही साथ सच्चे ईमानदार कर्तव्यनिष्ट लोगों को बेवजह परेशानी भी उठानी पड़ती है. और जो सबसे बड़ी सोचने वाली बात है वह यह है कि ऐसे गैरजिम्मेदाराना हरकतों से हम आने वाली पीढ़ी को क्या शिक्षा देंगे. ऐसे गैरजिम्मेदाराना एवं अश्लील हरकतों की रोकथाम के लिए संबंधित अधिकारियों के द्वारा कोई ठोस कार्यवाई नहीं की गयी है. शिकायत करने पर केवल एक आई डी काॅलर लगा दिया गया है, किन्तु इससे इस विभाग को कोई फायदा नहीं हो रहा है. फोन करने वाले मनचले समझाने पर असमाजिक तत्वों की भाँति पेश आते हैं. इन्हें अपने गुस्ताखी का एहसास भी नहीं है.ऐसे मनचलों ने 101 नम्बर को मजाक बना कर रख दिया है. ऐसी अश्लील हरकतों को करने वाले को सोचना चाहिए कि 101 नम्बर समाज की भलाई के लिए है. यह एक आपातकालीन व्यवस्था है. इसे मजाक के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए. यह जनसमुदाय की सेवा हेतु उपलब्ध कराया गया है. ऐसी मनचली, मनचली को ऐसे गैरजिम्मेदाराना हरकतों से बाज आना चाहिए. यदि संबंधित अधिकारी अथवा लोग इनके बिरूद्ध कार्रवाई पर अड़ जाएंगे, तो इनकी क्या हालत हो जाएगी. ऐसे गलत कार्य को बंद करना समाज के लिए अतिआवश्यक है.

पाण्डेय एस कुमार


कल्याण विभाग कितना कल्याणकारी?

झारखंड सरकार के लिए राज्य की जनता की बजाए यहाँ के कुछ अधिकारियों, कर्मचारियों दलालों एवं आपूर्तिकर्ताओं इत्यादि के कल्याण हेतु सरकारी योजनाएँ चलाई जा रही हैं? जी हाँ! राज्य में फैले हुए भ्रष्टाचारों को देखते हुए तो कुछ ऐसा ही लगता है. सरकार के लाख दावों के बावजूद यहाँ लूट की खुली छूट बदस्तुर जारी है. कल्याण विभाग के आवासीय स्कूलों में छात्रों को भोजन के नाम पर घटिया सामानों की आपूर्ति की जा रही है. कल्याण विभाग के कर्मचारियों ने आपूर्तिकर्ता विंध्यवासनी स्टोर के मालिक से साँठ-गाठ कर सरकार पैसों का बंदरबाँट कर लिया है. पौष्टिक खाद्यान्न की जगह विद्यार्थियों को सस्ते एवं मिलावटी आहारांे की आपूर्ति की जा रही है. इससे एक ओर जहाँ झारखंड के नौनिहालोें का बौद्धिक एवं शारीरिक विकास अवरूद्ध हो रहा है, वहीं दूसरी ओर उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ भी किया जा रहा है. विद्यार्थियों के लिए मँहगें चावल, मीट-पनीर मेवे आदि का आवँटन सरकार के द्वारा किया जाता है. पर बीच के दलालों के द्वारा केवल कागजों पर अच्छे सामग्रियांे की आपूर्ति दिखा दी जाती है. और इसके बदले घटिया किस्म के सामानों की आपूर्ति की जाती है. यही नहीं आवासीय स्कूलों में विद्यार्थियों की हमेशा शत-प्रतिशत उपस्थिति दिखाई जाती है. और उनके नाम पर पैसे की बंदरबाँट की जाती है. जबकि यह सामान्य बात है कि किसी भी विद्यालय में हमेशा शत-प्रतिशत उपस्थिति नहीं रहती है. कई स्कूलों के छात्रावास अधीक्षकों को अनैतिक कार्य करने के लिए धमकाया भी जाता है. राज्य के अनेक आवासीय विद्यालयों एवं रिमांड होम में इसके अलावा और भी दूसरे अनैतिक कार्यों को भ्रष्ट लोगों के द्वारा अंजाम दिया जाता है. पर यहाँ की सुध लेने की फुर्सत न तो सरकार को  है न और ही समाज सेवकों को.

के ई सैम

सैनिक अर्धसैनिक बलों में लगातार नैतिकता का ह्नास

जिस प्रकार देश में सैनिक अर्धसैनिक बलों के क्रियाकलापों में लगातार नैतिकता का ह्नास हो रहा है. और दिन प्रतिदिन घोटालों का समावेश हो रहा है, वह अत्यंत ही चिन्तनीय एवं शर्मनाक है. वैसे तो समाज का हरेक क्षेत्र भ्रष्टचार रूपी गंदगी में लोट रहा है, पर उसमें कुछ ऐसे क्षेत्र हैं, जिनका इससे दूर रहना देश हित में अतिआवश्यक है. रक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा, सूचना आदि कुछ ऐसे ही महत्वपूर्ण विभाग हैं, जिनका चुस्त-दुरूस्त एवं अनुशासित रहना देश की सुरक्षा और भविष्य के लिए अत्यंत ही महत्वपूर्ण है. देश के सैनिक, अर्धसैनिक बलों में घोटालों का मामला प्रायः प्रकाश में आता रहता है. बिहार-झारखंड सेक्टर के सीआरपीएफ आईजी-सह-भर्ती बोर्ड के चेयरमैन पुष्कर सिंह राँची निवासी मुजफ्फरपुर डीआईजी पी एम बाखला मेदनी नगर के कमान्डेन्ट यादवेन्द्र सिंह और जमालपुर के कमाण्डेंट पंकज चैरसिया समेत कुछ 11 लोंगों की गिरफ्तारी इसी घोटलों की शृंखला की एक कड़ी है. इन पर सीआरपीएफ में सिपाही एवं जेनरल ड्यूटी के पदों पर भर्ती के एवज रिश्वत लेने का आरोप है. सीबीआई की टीम में देश के 20 से अधिक ठीकानों पर 5 मई को छापा मार कर रैकेट में शामिल अधिकारियों और दलालों को गिरफ्तार किया है. सभी को रिमांड में लेकर गहन पूछताछ की जा रही है. अब तक करीब 20 करोड़ रुपए से अधिक की उगाही की जा चुकी है. गिरफ्तार लोगों में कई महत्वपूर्ण जानकारियाँ सीबीआई दी है जैसे -भर्ती बोर्ड का गठन कैसे होता था. दलालों से संबंध रखने वाले को ही बोर्ड में शामिल किया जाता था.

रिश्वत देने वाले युवाओं की खानापूर्ति के लिए अलग से परीक्षा ली जाती थी. स्पष्ट है, पैसे की लालच में इस प्रकार सैनिक, अर्धसैनिक बलांे में भर्ती करने की प्रक्रिया में नियमों एवं अनिवार्य शर्तों की अनदेखी की जाती है. सुरक्षा की दृष्टि से जिन मापदंडों की अनिवार्यता है, उन्हें रुपए की खातिर नकार कर देश की सुरक्षा और अस्मिता के साथ खिलवाड़ किया जाता है. दुसरी तरफ अनेक गरीब युवा नौकरी पाने की ललक में खेत जमीन बेचकर ऋण लेकर रिश्वत देते हैं. फिर भी उनकी नौकरियों की कोई गारंटी नहीं होती. ऐसे में सरकार को ध्यान देना चाहिए कि सुरक्षा बलों के अधिकारियों, कर्मचारियों के वेतन में प्रयाप्त वृद्धि करे ताकि वो पैसे की खातिर इस प्रकार के अनैतिक कार्यों का सहारा न लें. इसमें केवल एक पक्ष को गिरफ्तार करने से कुछ नहीं होगा. उन लोगों को भी गिरफ्तार करना चाहिए, जिन्होंने रिश्वत देकर नौकरी पाने की कोशिश की है. कुशल एवं योग्य उमीदवारो का हक छीना है, इससे भविष्य में घूस देकर अनैतिक रूप से नौकरी पाने वाले युवक भी ऐसे अवैध कार्य करने से डरेंगे. 

के ई सैम

 

 

‘‘जब तक खरीदने की ताकत रहेगी, बाजार चलेगा’’

एक अरब से ज्यादा आबादी वाले इस देश में 10-20 लाख लोग भी जानते होंगे या नहीं भी जानते होंगे कि निफ्टी, क्या है, सेन्सेक्स क्या है, सूचांक क्या है, लिवाली-विकवाली क्या है, ब्रोकर, तेजरिये, मंदरिए क्या है. करोड़ों-करोड़ लोग यही जानते हैं कि कीमतें से बढ़ती जा रही है. प्रधानमंत्री जी कहते हैं कि विकास होगा, तो कीमतें बढ़ेंगी. यह भी 50 प्रतिशत से ज्यादा जनता नहीं समझती कि विकास का मतलब क्या है. कीमतों का बढ़ना ही कही विकास तो नहीं. प्रधानमंत्रीजी कहते हैं कि अभी, पर वे पकड़ कर रखें हुए हैं. यह भी जनता नहीं जानती. मँहगाई बेकाबू है. कीमतें वश के बाहर है, तो फिर सरकार क्या कर रही है? क्या आम आदमी ऐसे ही जीने के लिए अभिशप्त है? आज लाखों लोगों को दो वक्त की रोटी नहीं मिलती, तो फिर मँहगाई के इस दौर में वे दो वक्त के बदले एक वक्त की रोटी की भी  जुगाड़ कर पायेंगे कि नहीं, ठीक-ठीक कहा नहीं जा सकता. विवश हो कर हम चिल्ला रहे हैं कि बाजार का ये हाल है. ग्राहक पीला और दुकानदार लाल है. पर इस पर पीले ग्राहक को कोई नहीं पूछता. आज बाजार लाल दुकानदार के बदौलत चलता है. इंस्पेक्टर से लेकर आफिसर तक का दूर-दूर तक पता नहीं. लाल दुकानदार साहब को थैली घर पहुँचा जाता है. और उस थैली की कीमत पीले ग्राहक से वसूलते हैं.

कल बाजार में तेल की कीमत 50 रुपए थी और 55 रुपए की हो गई. कल दाल की कीमत 40 रुपए थी 45 की हो गई. आलू कल 12 रुपए का था आज 14 का हो गया. केला 50 रुपए दर्जन बिक रहे रहे हैं. यह सब कैसे हो गया. किसी को समझ में ने नहीं आता. कीमतें आदमी को रूला रही है. कीमतें आदमी को सता रही है. घर में लगी महिलाएँ बजट बनाने में माथा खपा रही हैं. कल क्या होगा? मँहगाई कहाँ जाकर थमेगी?

नेताओं की संपत्ति कैसे करोड़ों मंे पहुँच जाती है, किसी को कुछ समझ में नहीं आता. अफसरों की संपत्ति करोड़ों में हो जाती है, किसी को कुछ समझ में नहीं आता. व्यापारी एक दिन में माल दबा कर लाखों कमा लेते हैं. इसको भी कोई समझ नहीं पाता. मँहगाई कैसे बढ़ जाती है, किसी को कुछ समझ में नहीं आता.

अब तो पानी वाली बाई नहीं रही कि वो आन्दोलन करती. राजनीति और सत्ता में व्यस्त किसी राजनीतिक पार्टियों को इसके बारे में याद नहीं आता. कहीं कोई नहीं है, कीमतों से खुद को जुझना होगा.

छमिया, जब तक तेरे पाँव चलेंगे, तेरे यार की जिन्दगी रहेगीउसी तर्ज पर ‘‘जब तक खरीदने की ताकत रहेगी, बाजार चलेगा’’

विजय रंजन