कार्टून :- वर्ना ये देश गड्ढे में जाएगा… देख लेना

महाशोक: डॉ चित्रा चतुर्वेदी ‘कार्तिका’ नहीं रहीं -acharya sanjiv ‘salil

10 September 2009
महाशोक: डॉ चित्रा चतुर्वेदी ‘कार्तिका’ नहीं रहीं -acharya sanjiv ‘salil
Acharya Sanjiv Salil
http://divyanarmada.blogspot.com
संस्कारधानी जबलपुर, ८ सितंबर २००९, बुधवार. सनातन सलिल नर्मदा तीर पर स्थित महर्षि जाबाली, महर्षि महेश योगी और महर्षि रजनीश की तपस्थली संस्कारधानी जबलपुर में आज सूर्य नहीं उगा, चारों ओर घनघोर घटायें छाई हैं. आसमान से बरस रही जलधाराएँ थमने का नाम ही नहीं ले रहीं. जबलपुर ही नहीं पूरे मध्य प्रदेश में वर्षा की कमी के कारण अकाल की सम्भावना को देखते हुए लगातार ४८ घंटों से हो रही इस जलवृष्टि को हर आम और खास वरदान की तरह ले रहा है. यहाँ तक की २४ घंटों से अपने उड़नखटोले से उपचुनाव की सभाओं को संबोधित करने के लिए आसमान खुलने की राह देखते रहे और अंततः सड़क मार्ग से राज्य राजधानी जाने के लिए विवश मुख्यमंत्री और राष्ट्र राजधानी जाने के लिए रेल मार्ग से जाने के लिए विवश वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री भी इस वर्षा के लिए भगवन का आभार मान रहे हैं किन्तु कम ही लोगों को ज्ञात है कि भगवान ने देना-पावना बराबर कर लिया है. समकालिक साहित्य में सनातन मूल्यों की श्रेष्ठ प्रतिनिधि डॉ. चित्रा चतुर्वेदी ‘कार्तिका’ को अपने धाम ले जाकर प्रभुने इस क्षेत्र को भौगोलिक अकाल से मुक्त कर उसने साहित्यिक बौद्धिक अकाल से ग्रस्त कर दिया है.
ग्राम होरीपूरा, तहसील बाह, जिला आगरा उत्तर प्रदेश में २० सितम्बर १९३९ को जन्मी चित्राजी ने विधि और साहित्य के क्षेत्र में ख्यातिलब्ध पिता न्यायमूर्ति ब्रिजकिशोर चतुर्वेदी बार-एट-ला, से
सनातन मूल्यों के प्रति प्रेम और साहित्यिक सृजन की विरासत पाकर उसे सतत तराशा-संवारा और अपने जीवन का पर्याय बनाया. उद्भट विधि-शास्त्री, निर्भीक न्यायाधीश, निष्पक्ष इतिहासकार, स्वतंत्र विचारक, श्रेष्ठ साहित्यिक समीक्षक, लेखक तथा व्यंगकार पिता की विरासत को आत्मसात कर चित्रा जी ने अपने सृजन संसार को समृद्ध किया.
ग्वालियर, इंदौर तथा जबलपुर में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त चित्रा जी ने इलाहांबाद विश्व विद्यालय से १९६२ में राजनीति शास्त्र में एम्.ए. तथा १९६७ में डी. फिल. उपाधियाँ प्राप्तकर शासकीय स्वशासी महाकौशल कला-वाणिज्य महाविद्यालय जबलपुर में प्राध्यापक और विभागाध्यक्ष के रूप में कर्मठता और निपुणता के अभिनव मानदंड स्थापित किये.
चित्राजी का सृजन संसार विविधता, श्रेष्ठता तथा सनातनता से समृद्ध है.
द्रौपदी के जीवन चरित्र पर आधारित उनका बहु प्रशंसित उपन्यास ‘महाभारती’ १९८९ में उ.प्र. हिंदी संस्थान द्वारा प्रेमचंद्र पुरस्कार तथा १९९९३ में म.प्र. साहित्य परिषद् द्वारा विश्वनाथ सिंह पुरस्कार से सम्मानित किया गया.
ययाति-पुत्री माधवी पर आधारित उपन्यास ‘तनया’ ने उन्हें यशस्वी किया. लोकप्रिय मराठी साप्ताहिक लोकप्रभा में इसे धारावाहिक रूप में निरंतर प्रकाशित किया गया.
श्री कृष्ण के जीवन एवं दर्शन पर आधारित वृहद् उपन्यास ‘वैजयंती’ ( २ खंड) पर उन्हें १९९९ में उ.प्र. हिंदी संस्थान द्वारा पुनः प्रेमचंद पुरस्कार से अलंकृत किया गया.
उनकी महत्त्वपूर्ण काव्य कृतियों में प्रथा पर्व (महाकाव्य), अम्बा नहीं मैं भीष्म (खंडकाव्य), तथा वैदेही के राम खंडकाव्य) महत्वपूर्ण है.
स्वभाव से गुरु गम्भीर चित्रा जी के व्यक्तित्व का सामान्यतः अपरिचित पक्ष उनके व्यंग संग्रह अटपटे बैन में उद्घाटित तथा प्रशंसित हुआ.
उनका अंतिम उपन्यास ‘न्यायाधीश’ शीघ्र प्रकाश्य है किन्तु समय का न्यायाधीश उन्हें अपने साथ ले जा चुका है.
उनके खंडकाव्य ‘वैदेही के राम’ पर कालजयी साहित्यकार डॉ. विद्यानिवास मिश्र का मत- ”डॉ चित्रा चतुर्वेदी ने जीवन का एक ही संकल्प लिया है कि श्री राम और श्री कृष्ण की गाथा को अपनी सलोनी भाषा में अनेक विधाओं में रचती रहेंगी. प्रस्तुत रचना वैदेही के राम उसी की एक कड़ी है. सीता की करूँ गाथा वाल्मीकि से लेकर अनेक संस्कृत कवियों (कालिदास, भवभूति) और अनेक आधुनिक भारतीय भाषाओँ के कवियों ने बड़ी मार्मिकता के साथ उकेरी है. जैस अकी चित्रा जी ने अपनी भूमिका में कहा है, राम की व्यथा वाल्मीकि ने संकेत में तो दी, भवभूति ने अधिक विस्तार में दी पर आधुनिक कवियों ने उस पर विशेष ध्यान नहीं दिया, बहुत कम ने सोचा कि सीता के निर्वासन से अधिक राम का ही निर्वासन है, अपनी निजता से. सीता-निर्वासन के बाद से राम केवल राजा रह जाते हैं, राम नहीं रह जाते. यह उन्हें निरंतर सालता है. लोग यह भी नहीं सोचते कि सीता के साथ अन्याय करना, सीता को युगों-युगों तक निष्पाप प्रमाणित करना था.”
चित्रा जी के शब्दों में- ”आज का आलोचक मन पूछता है कि राम ने स्वयं सिंहासन क्यों नहीं त्याग दिया बजे सीता को त्यागने के? वे स्वयं सिंहासन प् र्बैठे राज-भोग क्यों करते रहे?इस मत के पीछे कुछ अपरिपक्वता और कुछ श्रेष्ठ राजनैतिक परम्पराओं एवं संवैधानिक अभिसमयों का अज्ञान भी है. रजा या शासक का पद और उससे जुड़े दायित्वों को न केवल प्राचीन भारत बल्कि आधुनिक इंग्लॅण्ड व अन्य देशों में भी दैवीय और महान माना गया है. रजा के प्रजा के प्रति पवित्र दायित्व हैं जिनसे वह मुकर नहीं सकता. अयोग्य राजा को समाज के हित में हटाया जा सकता था किन्तु स्वेच्छा से रजा पद-त्याग नहीं कर सकता था….कोइ भी पद अधिकारों के लिया नहीं कर्तव्यों के लिए होता है….”
चित्रा जी के मौलिक और तथ्यपरक चिंतन कि झलक उक्त अंश से मिलती है.
‘महाभारती में चित्रा जी ने प्रौढ़ दृष्टि और सारगर्भित भाषा बंध से आम पाठकों ही नहीं दिग्गज लेखकों से भी सराहना पाई. मांसलतावाद के जनक डॉ . रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’ के अनुसार- ”पारंपरिक मान्यताओं का पालन करते हुए भी लेखिका ने द्रौपदी कि आलोकमयी छवि को जिस समग्रता से उभरा है वह औपन्यासिकता की कसौटी पर निर्दोष उतरता है. डॉ. शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ के मत में- ”द्रौपदी के रूप में उत्सर्ग्शीला नारी के वर्चस्व को अत्यंत उदात्त रूप में उभरने का यह लाघव प्रयत्न सराहनीय है.”
श्री नरेश मेहता को ”काफी समय से हिंदी में ऐसी और इतनी तुष्टि देनेवाली रचना नजर नहीं आयी.” उनको तो ”पढ़ते समय ऐसा लगता रहा कि द्रौपदी को पढ़ा जरूर था पर शायद देखना आज हुआ है.”
आचार्य विष्णुकांत शास्त्री के अनुसार- ”द्रौपदी को महाभारती कहना अपने आप में एक विशिष्ट उपलब्धि है.”
स्वयं चित्रा जी के अनुसार- ”यह कहानी न्याय पाने हेतु भटकती हुई गुहार की कहानी है. आज भी न्याय हेतु वह गुहार रह-रहकर कानों में गूँज रही है. नारी की पीडा शाश्वत है. नारी की व्यथा अनंत है. आज भी कितनी ही निर्दोष कन्यायें उत्पीडन सह रही हैं अथवा न सह पाने की स्थिति में आत्मघात कर रही हैं.
द्रुपदनन्दिनी भी टूट सकती थी, झंझाओं में दबकर कुचली जा सकती थी. महाभारत व रामायण काल में कितनी ही कन्याओं ने अपनी इच्छाओं का गला घोंट दिया. कितनी ही कन्याओं ने धर्म के नाम पर अपमान व कष्ट का हलाहल पान कर लिया. क्या हुआ था अंबा और अंबालिका के साथ? किस विवशता में आत्मघात किया था अंबा ने? क्या बीती थी ययाति की पुत्री माधवी पर? अनजाने में अंधत्व को ब्याह दी जाने वाली गांधारी ने क्यों सदा के लिए आँखें बंद कर ली थीं? और क्यों भूमि में समां गयीं जनकनन्दिनी अपमान से तिलमिलाकर? द्रौपदी भी इसी प्रकार निराश हो टूट सकती थी. किन्तु अद्भुत था द्रुपदसुता का आत्मबल. जितना उस पर अत्याचार हुआ, उतनी ही वह भभक-भभककर ज्वाला बनती गयी. जितनी बार उसे कुचला गया, उतनी ही बार वह क्रुद्ध सर्पिणी सी फुफकार-फुफकार उठी. वह याज्ञसेनी थी. यज्ञकुंड से जन्म हुआ था उसका. अन्याय के प्रतिकार हेतु सहस्त्रों जिव्हाओंवाली अक्षत ज्वाला सी वह अंत तक लपलपाती रही.
नीलकंठ महादेव ने हलाहल पान किया किन्तु उसे सावधानी से कंठ में ही रख लिया था. कंठ विष के प्रभाव से नीला हो गया और वे स्वयं नीलकंठ किन्तु आजीवन अन्याय, अपमान तथा पीडा का हलाहल पी-पीकर ही दृपद्न्न्दिनी का वर्ण जैसे कृष्णवर्ण हो गया था. वह कृष्ण हो चली, किन्तु झुकी नहीं….”
चित्रा जी का वैशिष्ट्य पात्र की मनःस्थिति के अनुकूल शब्दावली, घटनाओं की विश्वसनीयता बनाये रखते हुए सम-सामयिक विश्लेषण, तार्किक-बौद्धिक मन को स्वीकार्य तर्क व मीमांसा, मौलिक चिंतन तथा युगबोध का समन्वय कर पाना है.
वे अत्यंत सरल स्वभाव की मृदुभाषी, संकोची, सहज, शालीन तथा गरिमामयी महिला थीं. सदा श्वेत वस्त्रों से सज्जित उनका आभामय मुखमंडल अंजन व्यक्ति के मन में भी उनके प्रति श्रृद्धा की भाव तरंग उत्पन्न कर देता था. फलतः, उनके कोमल चरणों में प्रणाम करने के लिए मन बाध्य हो जाता था.
मुझे उनका निष्कपट सान्निध्य मिला यह मेरा सौभाग्य है. मेरी धर्मपत्नी डॉ. साधना वर्मा और चित्रा जी क्रमशः अर्थशास्त्र और राजनीतिशास्त्र में एक ही महाविद्यालय में पदस्थ थीं. चित्रा जी साधना से भागिनिवत संबंध मानकर मुझे सम्मान देती रहीं. जब उन्हें ज्ञात हुआ कि मैं ईंट-पत्थर जुडवाने के साथ शब्द-सिपाही भी हूँ तो उनकी स्नेह-सलिला मुझे आप्लावित करने लगी. एक-दो बार की भेंट में संकोच के समाप्त होते ही चित्रा जी का साहित्यकार विविध विषयों खासकर लेखनाधीन कृतियों के कथानकों और पात्रों की पृष्ठभूमि और विकास के बारे में मुझसे गहन चर्चा करने लगा. जब उन्हें किसी से मेरी ”दोहा गाथा” लेख माला की जानकारी मिली तो उनहोंने बिना किसी संकोच के उसकी पाण्डुलिपि चाही. वे स्वयं विदुषी तथा मुझसे बहुत अधिक जानकारी रखती थीं किन्तु मुझे प्रोत्साहित करने, कोई त्रुटि हो रही हो तो उसे सुधारने तथा प्रशंसाकर आगे बढ़ने के लिए आशीषित करने के लिए उन्होंने बार-बार माँगकर मेरी रचनाएँ और लंबे-लंबे आलेख बहुधा पढ़े.
‘दिव्या नर्मदा’ पत्रिका प्रकाशन की योजना बताते ही वे संरक्षक बन गयीं. उनके अध्ययन कक्ष में सिरहाने-पैताने हर ओर श्रीकृष्ण के विग्रह थे. एक बार मेरे मुँह से निकल गया- ”आप और बुआ जी (महीयसी महादेवी जी) में बहुत समानता है, वे भी गौरवर्णा आप भी, वे भी श्वेतवसना आप भी, वे भी मिष्टभाषिणी आप भी, उनके भी सिरहाने श्री कृष्ण आपके भी.” वे संकुचाते हुए तत्क्षण बोलीं ‘वे महीयसी थीं मैं तो उनके चरणों की धूल भी नहीं हूँ.’
चित्रा जी को मैं हमेशा दीदी का संबोधन देता पर वे ‘सलिल जी’ ही कहती थीं. प्रारंभ में उनके साहित्यिक अवदान से अपरिचित मैं उन्हें नमन करता रहा और वे सहज भाव से सम्मान देती रहीं. उनके सृजन पक्ष का परिचय पाकर मैं उनके चरण स्पर्श करता तो कहतीं ‘ क्यों पाप में डालते हैं, साधना मेरी कभी बहन है.’ मैं कहता- ‘कलम के नाते तो कहा आप मेरी अग्रजा हैं इसलिए चरणस्पर्श मेरा अधिकार है.’ वे मेरा मन और मान दोनों रख लेतीं. बुआ जी और दीदी में एक और समानता मैंने देखी वह यह कि दोनों ही बहुत स्नेह से खिलातीं थीं, दोनों के हाथ से जो भी खाने को मिले उसमें अमृत की तरह स्वाद होता था…इतनी तृप्ति मिलती कि शब्द बता नहीं सकते. कभी भूखा गया तो स्वल्प खाकर भी पेट भरने की अनुभूति हुई, कभी भरे पेट भी बहुत सा खाना पड़ा तो पता ही नहीं चला कहाँ गया. कभी एक तश्तरी नाश्ता कई को तृप्त कर देता तो कभी कई तश्तरियाँ एक के उदार में समां जातीं. शायद उनमें अन्नपूर्णा का अंश था जो उनके हाथ से मिली हर सामग्री प्रसाद की तरह लगती.
वे बहुत कृपण थीं अपनी रचनाएँ सुनाने में. सामान्यतः साहित्यकार खासकर कवि सुनने में कम सुनाने में अधिक रूचि रखते हैं किन्तु दीदी सर्वथा विपरीत थीं. वे सुनतीं अधिक, सुनातीं बहुत कम.
अपने पिताश्री तथा अग्रज के बारे में वे बहुधा बहुत उत्साह से चर्चा करतीं. अपनी मातुश्री से लोकजीवन, लोक साहित्य तथा लोक परम्पराओं की समझ तथा लगाव दीदी ने पाया था.
वे भाषिक शुद्धता, ऐतिहासिक प्रमाणिकता तथा सम-सामयिक युगबोध के प्रति सजग थीं. उनकी रचनाओं का बौद्धिक पक्ष प्रबल होना स्वाभाविक है कि वे प्राध्यापक थीं किन्तु उनमें भाव पक्ष भी सामान रूप से प्रबल है. वे पात्रों का चित्रण मात्र नहीं करती थीं अपितु पात्रों में रम जाती थीं, पात्रों को जीती थीं. इसलिए उनकी हर कृति जादुई सम्मोहन से पाठक को बाँध लेती है.
उनके असमय बिदाई हिंदी साहित्य की अपूरणीय क्षति है. शारदापुत्री का शारदालोक प्रस्थान हिंदी जगत को स्तब्ध कर गया. कौन जानता था कि ८ सितंबर को न उगनेवाला सूरज हिंदी साहित्य जगत के आलोक के अस्त होने को इंगित कर रहा है. कौन जानता था कि नील गगन से लगातार हो रही जलवृष्टि साहित्यप्रेमियों के नयनों से होनेवाली अश्रु वर्षा का संकेत है. होनी तो हो गयी पर मन में अब भी कसक है कि काश यह न होती…
चित्रा दीदी हैं और हमेशा रहेंगी… अपने पात्रों में, अपनी कृतियों में…नहीं है तो उनकी काया और वाणी… उनकी स्मृति का पाथेय सृजन अभियान को प्रेरणा देता रहेगा. उनकी पुण्य स्मृति को अशेष-अनंत प्रणाम.
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मेरे पहले साहित्यिक गुरु : ब्रजेश परसाई

इस शिक्षक दिवस पर मैंने यादों की गुल्लक को खंगाला। याद किया कि मेरी जिंदगी में कौन लोग थे,जो शिक्षक नहीं थे,पर उनसे अनजाने में मैंने बहुत सीखा। मुझे ब्रजेश भाई बहुत याद आए। वे मेरे पहले साहित्यिक गुरु थे मैं यह कह सकता हूं। साहित्यिक की बारीकियों को देखने का तरीका मैंने उनसे सीखा।

यह होशंगाबाद में 1982 का जमाना था। मध्यप्रदेश साहित्य परिषद ने पाठकमंच की योजना शुरू की थी। इसके तहत प्रदेश के लगभग हर जिला मुख्यालय पर पाठक मंच का गठन किया गया था। जब भी कोई नई किताब प्रकाशित होती,परिषद उसकी दो प्रतियां हर पाठक मंच में भेजती। वहां उस पर पाठक मंच का कोई एक सदस्य समीक्षा लिखता और फिर पर चर्चा होती। होशंगाबाद में पाठक मंच के संयोजक ब्रजेश परसाई थे। वर्षों तक उन्होंने पाठक मंच का कुशल संचालन किया। पेशे से वे बैंक कर्मचारी थे। नए-नए खुले क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक में वे नौकरी करते थे।

मेरी शाम अक्सर उनके घर पर साहित्य और दुनिया जहान की चर्चा करते हुए बीतती थी। शनिचरा मोहल्ले में होली चौक से थोड़ा आगे गली में उनका घर था। उनके घर से कुछ पचास कदम दूर पर नर्मदा बहती है। नर्मदा किनारे सुंदर सेठानी घाट है। कई बार हम घाट पर जाकर बैठ जाते और घंटों बैठे रहते। घाट तो अब भी हैं, नर्मदा भी बह रही है। पर ब्रजेश भाई नहीं हैं। 2005 में हार्टअटैक से उनका निधन हो गया।

ब्रजेश भाई ठिगने कद के लेकिन भारी शरीर के मालिक थे। चलते तो लगता जैसे कोई गोलमटोल गुड्डा लुढ़कता हुआ चला आ रहा हो। अपनी अलंकारित भाषा में अच्छे–अच्छे लोगों की खिल्ली कुछ इस तरह उड़ाते थे कि आपको कतई बुरा नहीं लगता था। उनके चेहरे पर हमेशा मुस्कान रहती थी। किसी के बारे में कुछ बताते हुए उनकी आंखें कुछ इस तरह फैल जातीं कि बस आपने ध्यान नहीं दिया तो बाहर ही आ जाएंगी। उनकी हंसी ऐसी थी जैसे किसी कांच के मर्तबान से कंचे एक-एक करके बाहर आते हुए आवाज कर रहे हों। वे हमेशा अपटूडेट रहते।

समकालीन साहित्य के बारे में वे जितना पढ़ते थे शायद उन दिनों शहर में कोई और नहीं पढ़ता था। इसलिए मुझे उनके पास बैठना,बात करना अच्छा लगता था। मशहूर लघुपत्रिका पहल मैंने पहली बार उनके घर में ही देखी। तमाम और साहित्य पत्रिकाएं उनके यहां आती थीं। मैं उनसे पत्रिकाएं लेकर पढ़ता था। पाठक मंच में मैंने दो किताबों की समीक्षा लिखी थी। एक थी भगवत रावत की कविताओं की ‘किताब दी हुई दुनिया।’ दूसरी किताब रमाकांत श्रीवास्तव की कहानियों का संग्रह था।

यह समय लघुकथा का था। लघुकथा आंदोलन चल रहा था। ब्रजेश भाई भी लघुकथाएं लिखते थे और मैं भी। ब्रजेश भाई ने अपने प्रयासों से लघुकथाओं पर केन्द्रित दो अखिल भारतीय कार्यक्रम होशंगाबाद में करवाए। जिनमें उस समय के कई मशहूर लघुकथाकार शामिल हुए थे। जिनमें कन्हैयालाल नंदन,बलराम,शंकर पुणतांबेकर,सतीश दुबे,मालती महावर,हरि जोशी,विक्रम सोनी,कृष्ण कमलेश जैसे कई नाम शामिल थे। मैं भी इन कार्यक्रमों में शामिल था।

नाटकों में भी उनकी खासी रुचि थी। भोपाल में उन दिनों भारत भवन नया-नया बना था। उसके साहित्यिक कार्यक्रमों को देखने-सुनने वे अक्सर जाया करते थे। जब वे लौटते तो उनसे मैं उन कार्यक्रमों के बारे में सुनता।

वे मुझ से लगभग तीन साल बड़े थे पर मेरी शादी उनसे पहले हुई। शादी पर जब वे घर आए और मेरी पत्नी निर्मला वर्मा से मिले तो कहा, ‘अब आप इन्हें निर्मल वर्मा बना दें।’ यह बात मुझे अब भी याद है। उन दिनों निर्मला हिन्दी साहित्य की प्राध्यापिका थीं। ब्रजेश भाई नहीं हैं पर उनका मुस्कराता चेहरा आज भी मेरी आंखों में बसा है।
** राजेश उत्‍साही

बन जा मेरी मात यशोदा

काफी दिन पहले मेरी धर्मपत्‍नी द्वारा लिखित एक भजन आज आपको पढा रहा हूं आशा है आप सभी को पसंद आएगी। यह भजन मेरी पत्‍नी ने जन्‍माष्‍टमी पर लिखा था लेकिन कुछ व्‍यस्‍तता के चलते आज इसे आप सभी को पढवा रहा हूं

तू बन जा मेरी मात यशोदा
मैं कान्‍हा बन जाऊं
जा यमुना के तीरे मां
बंशी मधुर बजाऊं
इक छोटा सा बाग लगा दे
जहां झूमूं नाचू गाऊं
घर-घर जाकर माखन मिश्री
चुरा चुरा के खाऊं
इक छोटी सी राधा लादे
जिसके संग रास रचाऊं
तू ढूंढे मुझे वन उपवन
मैं पत्‍तों में छिप जाऊं
तू बन जा मेरी मात यशोदा
मैं कान्‍हा बन जाऊं

बेजुबान जानवरों पर अत्‍याचार

एक बार एक किसान अपने पशुओं के लिए भुस यानि सूखा चारा लेने पास के गांव जाने की तैयारी करने लगा। इसकी भनक जैसे ही उसके सबसे छोटे बेटे और घर आये हुए एक नाती जो उम्र में अभी काफी छोंटे थे, को लगी तो वे भी खुश होकर तैयार होने लगे। लेकिन किसान के बड़े बेटे व नौकर मुश्‍ताक को जैसे ही पता चला उन दोनों ने दोनों बच्‍चों के उत्‍साह को निराशा में बदल दिया। और बैलगाड़ी में बैठने से मना कर दिया। दोनों रोने झींकने लगे। तभी उस किसान ने एक को यानि कि अपने नाती की तरफ इशारा करते हुए कहा कि चलो इसे ले चलते हैं। फिर तो किसान का बेटा और जिद करने लगा। कारण तो साफ था अगर दोनों को मना कर देते तो ठीक था। एक को ले जाएं और एक को न ले जाएं ये भी कोई से को भी मंजूर नहीं होना था।
काफी हुज्‍जत के बाद किसान ने आपने बेटे को भी मजबूर हो, साथ चलने की इजाजत दे दी। अब दोनों खुश थे और बैलगाड़ी की यात्रा का आनंद ले रहे थे। तभी अचानक एक समस्‍या आ गयी और किसान ने कहा दोनों उतर जाओ और पेड़ के पास खड़े हो जाओ। किसान के नाती और बेटे को ये बात पहले तो समझ नहीं आयी कि क्‍या हुआ पर कुछ देखने से समझ आया कि आगे रेलवे फाटक को बैल, न जाने किस भय से पार नहीं कर रहे हैं। किसान का बड़ा बेटा और नौकर पहले तो अपने अपने प्रयास करते रहे कि बैल आगे बढ़ें लेकिन बैल थे कि आगे बढ़ने का नाम नहीं ले रहे थे। तब तो फिर दोनों का गुस्‍सा सातवे आसमान पर था। और दोनों ही बारी बारी से उन पशुओं को डंडों से बुरी तरह पीट रहे थे।
उनको पिटता देख, किसान के छोटे बेटे से नहीं रहा गया। उसने अपने पिता को कमीज खींच कर अपनी और आकर्षित किया फिर कहा…. मैं बताऊं हम फाटक पार कैसे जा सकते हैं। तभी किसान ने कहा, कैसे……….. हम दोनों बच्‍चे इन दोनों बैलों को जेवड़ा पकड़ कर रेलवे फाटक को पार करा देते है और ये दोनों गाड़ी को हाथ से खींच कर फाटक पार ले जाएं और वहां जाकर इन बैलों को फिर से बैलगाड़ी में जोत देंगे। बस …. काम बन जायेगा। यही बात किसान ने अपने बड़े बेटे और नौकर मुश्‍ताक को बताई लेकिन उन पर तो जैसे बैलों को मारने का भूत सवार था। दोनों ही दोनों बैलों को डंडे से मारे ही जा रहे थे। राह चलते लोग भी ये सब तमाशा देख रहे थे। काफी भीड़ जुट गयी थी। बैलों को पिटते पिटते घायल कर दिया था दोनों ने। किसान के छोटे बेटे को ये दर्दनाक लग रहा था। उससे बैलों के नाक और मुंह से खून टपकना उसके मन पर प्रहार कर रहा था। चोट उन बैलों के साथ साथ उस बाल मन पर भी पड़ रही थी जो जबर्दस्‍ती गाड़ी में आया था। उसे अपना जिद करके आना भी उसको अपराधी महसूस करा रहा था। इसी कारण से वह कुछ ज्‍यादा नहीं बोल रहा था।
बैलों की बेहद पिटाई देख कर और महसूस कर उसने फिर साहस कर के अपने पिता से कहा…. मान जाओ मेरी बात…… मैं और ये ‘ किसान का नाती’ बैलों को ले चलते हैं और इन्‍हें कहो ये बैलगाड़ी को लेकर चलें और रेलवे फाटक को पार कर के फिर से बैलगाड़ी जोड़ लेंगे। तभी किसान भी बैलों की अत्‍यधिक पिटाई देख कर परेशान हो चुके थे, झट से छोटे बेटे की बात को मान लेने के लिए जोर डाला और उन्‍होंने भी हार थक कर बात मान ली। और फिर क्‍या था, बात ऐसी बनी कि किसान ने अपने छोटे बेटे को शाबाशी देकर अपने गंतव्‍य की तरफ बढ़ चले।
वापस घर पंहुचने पर यह चर्चा आम रही और किसान के छोटे बेटे की तारीफ हुई।
लेकिन वह छोटा बेटा रात भर सो नहीं पाया और यही सोचता रहा कि भुस आता या नहीं आता उसके बिना तो कुछ दिन काम चल सकता था लेकिन अगर मैं जिद कर के न जाता तो इन बैलों को और कितनी मार झेलनी पड़ती। किसान के उस छोटे बेटे ने रात भर कल्‍पनाओं में उन बेजुबान जानवरों की बेरहम पिटाई का दर्द सहा।

और अंत में बता दूं कि वह बालक मैं ही था जो रात भर नहीं सो पाया था।

कार्टून :- आओ मेरे गाँव के डॉक्टर से मिलो

अर्थी तो उठी..३ (अन्तिम)

पिछली किश्त में मैंने बताया की, तसनीम की दिमागी हालत बिगड़ती जा रहे थी…लेकिन उसकी गंभीरता मानो किसी को समझ में नही आ रही थी…

उसे फिर एकबार अपने पती के पास लौट जाने के लिया दबाव डाला जा रहा था..जब कि, पतिदेव ख़ुद नही चाहते थे कि,वो लौटे…हाँ..बेटा ज़रूर उन्हें वापस चाहिए था..!

हम लोग उन दिनों एक अन्य शहर में तबादले पे थे। दिन का समय था…मेरी तबियत ज़रा खराब थी…और मै , रसोई के काम से फ़ारिग हो, बिस्तर पे लेट गयी थी…तभी फोन बजा….लैंड लाइन..मैंने उठा लिया..दूसरी ओर से आवाज़ आयी,
” तसनीम चली गयी…” आवाज़ हमारे एक मित्र परिवार में से किसी महिला की थी…
मैंने कहा,” ओह ! तो आख़िर अमेरिका लौट ही गयी..पता नही,आगे क्या होगा…!”

उधर से आवाज़ आयी,” नही…अमेरिका नही..वो इस दुनियाँ से चली गयी और अपने साथ अपने बेटे को भी ले गयी…बेटी बच गयी…उसने अपने बेटे के साथ आत्महत्या कर ली…”
मै: ( अबतक अपने बिस्तर पे उठके बैठ गयी थी)” क्या? क्या कह रही हो? ये कैसे…कब हुआ? “

मेरी मती बधीर-सी हो रही थी…दिल से एक सिसकती चींख उठी…’नही…ये आत्महत्या नही..ये तो सरासर हत्या है..आत्महत्या के लिए मजबूर कर देना,ये हत्या ही तो है..’

खैर! मैंने अपने पती को इत्तेला दे दी…वे तुंरत मुंबई के लिए रवाना हो गए…
बातें साफ़ होने लगीं..तसनीम ने एक बार किसी को कहा था,’ मेरी वजह से, मेरे भाई की ज़िंदगी में बेवजह तनाव पैदा हो रहे हैं..क्या करूँ? कैसे इन उलझनों को सुलझाऊँ? ‘

तसनीम समझ रही थी,कि, उसकी भाभी को वो तथा उसके बच्चों का वहाँ रहना बिल्कुल अच्छा नही लग रहा था…उसके बच्चे भी, अपनी मामी से डरे डरे-से रहते थे..जब सारे रास्ते बंद हुए, तो उसने आत्म हत्या का रास्ता चुन लिया..पिता कैंसर के मरीज़ थे..माँ दिल की मरीज़ थी..तसनीम जानती थी,कि, इनके बाद उसका कोई नही..कोई नही जो,उसे समझ सकगा..सहारा दे सकेगा..और सिर्फ़ अकेले मर जाए तो बच्चे अनाथ हो,उनपे पता नही कितना मानसिक अत्याचार हो सकता है????

उसने अपने दोनों बच्चों के हाथ थामे,और १८ मंज़िल जहाँ , उसके माँ-पिता का घर था, छलांग लगा दी…दुर्भाग्य देखिये..बेटी किंचित बड़ी होने के कारण, उसके हाथ से छूट गयी..लेकिन उस बेटी ने क्या नज़ारा देखा ? जब नीचे झुकी तो? अपनी माँ और नन्हें भाई के खून से सने शरीर…! क्या वो बच्ची,ता-उम्र भुला पायेगी ये नज़ारा?

अब आगे क्या हुआ? तसनीम की माँ दिल की मरीज़ तो थी ही..लेकिन,जब पुलिस उनके घर तफ्तीश के लिए आयी तो इस महिला का बड़प्पन देखिये..उसने कहा,” मेरी बेटी मानसिक तौर से पीड़ित थी..मेरी बहू या बेटे को कोई परेशान ना करना॥”

इतना कहना भर था,और उसे दिलका दौरा पड़ गया..जिस स्ट्रेचर पे से बेटी की लाश ऊपर लाई गयी,उसी पे माँ को अस्पताल में भरती कराया गया..तीसरे दिन उस माँ ने दम तोड़ दिया…उसके आख़री उदगार, उसकी, मृत्यु पूर्व ज़बानी( dying declaration)मानी गयी..घर के किसी अन्य सदस्य पे कोई इल्ज़ाम नही लगा…!

इस बच्ची का क्या हुआ? यास्मीन के नाम पे उसके पिता ने अपनी एक जायदाद कर रखी थी..ये जायदाद, एक मशहूर पर्वतीय इलाकेमे थी…पिता ने इस गम के मौक़े पे भी ज़हीन संजीदगी दिखायी..उन्हीं के बिल्डिंग में रहने वाले मशहूर वकील को बुला, तुंरत उस जायदाद को एक ट्रस्ट में तब्दील कर दिया, ताकि,दामाद उस पे हक ज़माने ना पहुँच जाय..
और कितना सही किया उन्हों ने…! दामाद पहुँच ही गया..उस जायदाद के लिए..बेटी को तो एक नज़र भर देखने में उसे चाव नही था…हाँ..गर बेटा बचा होता तो उसे वो ज़रूर अपने साथ ले गया होता..

उस बेटी के पास अब कोई चारा नही था..उसे अपने मामा मामी के पासही रहना पड़ गया..घर तो वैसे उसके नाना का था…! लेकिन इस हादसे के बाद जल्द ही, तसनीम के भाई ने अपने पिता को मुंबई छोड़, एक पास ही के महानगर में दो मकान लेने के लिए मजबूर कर दिया..अब ना इस बच्ची को उनसे मिलने की इजाज़त मिलती..नाही उनके अपने बच्चे उनसे मिलने जाते..उनके मनमे तो पूरा ज़हर भर दिया गया..इस वृद्ध का मानसिक संतुलन ना बिगड़ता तो अजीब बात होती..जिसने एक साथ अपनी बेटी, नवासा और पत्नी को खोया….

इस बच्ची ने अपने सामने अपनी माँ और भाई को मरते देखा..और तीसरे दिन अपनी नानी को…! इस बात को बीस साल हो गए..उस बच्ची पे उसकी मामा मामी ने जो अत्याचार किए, उसकी चश्मदीद गवाह रही हूँ..इतनी संजीदा बच्ची थी..इस असुरक्षित मौहौल ने उसे विक्षप्त बना दिया..वो ख़ुद पर से विश्वास खो बैठी…कोई घड़ी ऐसी नही होती, जब वो अपनी मामी या मामा से झिड़की नही सुनते..ताने नही सुनती….अपने मामा के बच्चे..जो उसके हम उम्र थे…वो भी, इन तानों में, झिड़कियों में शामिल हो जाते…

ये भी कहूँ,कि, आजतलक,उस बच्ची के मुँह से किसी ने उस घटना के बारेमे बात करते सुना,ना, अपनी मामा मामी या उनके बच्चों के बारेमे कुछ सुना…जैसे उसने ये सारे दर्द,उसने अपने सीनेमे दफना दिए….

ट्रस्ट में इस बात का ज़िक्र था कि, जब वो लडकी, १८ साल की हो जाय,तो उस जायदाद को उसके हवाले कर दिया जाय..वो भी नही हुआ..

मामाकी,अलगसे कोई कमाई नही थी…अपने बाप की जायदाद बेच जो पैसा मिला, उसमे से उसने,अलग,अलग जायदाद,तथा share खरीदे…और वही उन सबका उदर निर्वाह बना..और खूब अच्छे-से…बेटा बाहर मुल्क में चला गया..तसनीम की माँ के बैंक लॉकर में जो गहने-सोना था, बहू ने बेच दिया…ससुर के घर में जो चांदी के बर्तन थे, धीरे,धीरे अपने घर लाती गयी…और परदेस की पर्यटन बाज़ी उसी में से चलती रही…

अब अगर मै कहूँ,कि, काश वो बद नसीब बच्ची नही बचती तो अच्छा होता,तो क्या ग़लत होगा? उसकी पढ़ाई तो हुई..क्योंकि,अन्यथा, मित्र गण क्या कहते? इस बात का डर तो मामा मामी को था..लेकिन पढाई के लिए पैसे तो उस बच्ची के नाना दे रहे थे! उस बच्ची को बारह वी के बाद सिंगापूर एयर लाइन की शिष्य वृत्ती मिली..उसे बताया ही नही गया..ये सोच कि,वहाँ न जाने क्या गुल खिलायेगी…! जो गुल उसने नही खिलाये, वो इनकी अपनी औलाद ने खिला दिए..इनकी अपनी बेटी ने क्या कुछ नही करतब दिखाए?

इन हालातों में तसनीम के पास आत्म हत्या के अलावा क्या पर्याय था? वो तो अपने भाई का घर बिखरने से बचाना चाह रही थी…! गर उसकी मानसिक हालत को लेके,उसके सगे सम्बन्धियों सही समय पे दक्षता दिखायी होती,तो ये सब नही होता…पर वो अपने पती के घर लौट जाय,यही सलाह उसे बार बार मिली…और अंत में उसने ईश्वर के घर जाना पसंद कर लिया…मजबूर होके!

उस बच्ची का अबतक तो ब्याह नही हुआ..आगे की कहानी क्या मोड़ लेगी नही पता..लेकिन इस कहानी को बयाँ किया..यही सोच,कि, क्यों एक औरत को हर हाल में समझौता कर लेने के लिए मजबूर किया जाता है? इस आत्महत्या को न मै कायरता समझती हूँ,ना गुनाह..हाँ,एक ज़ुल्म,एक हत्या ज़रूर समझती हूँ…ज़ुल्म उस बच्ची के प्रती भी…जिसने आज तलक अपना मुँह नही खोला..हर दर्द अंदरही अन्दर पी गयी…

अर्थी तो उठी…२

आगेका भाग लिखने जा रही हूँ….
किसी ने कहा था, आत्महत्या पर्याय नही। हमें पहले ये जान लेना होगा कि, वजूहात कैसे और कौनसे रहे। आत्महत्या करने वाले व्यक्ती मे अक्सर ‘sirotinin’की मात्रा कम पाई जाती है..ये एक वैद्यकीय सत्य है।

हम रानी पद्मिनी को ‘सती’ मान के उसका गौरव करते हैं ! इतिहास उन ‘हजारों पद्मिनिओं ‘ का गौरव करता है..लेकिन जब एक साधारण -सी औरत, दूसरों को कष्ट न पहुँचे, इसलिए अपने जीवन का अंत कर लेती है,तो उसे क्यों दोषी समझा जाता है? एक तो उसने अपने जीवन हाथ धो लिए, और उसीपे इल्ज़ाम? ऐसा क्यों?

तो आईये,आपको हालातों से वाबस्ता करा दूँ।

ये लडकी एक खुले विचारों वाले परिवार में पली बढ़ी। माँ एक दक्षिण भारतीय ब्रह्मिण परिवार से थी..पिता मुस्लिम।

भाई का ब्याह जिस लडकी से हुआ था, वो लडकी भी इसी तरह, दो भिन्न परिवेश से आए माता -पिता की कन्या थी/है। माँ अँगरेज़। पिता पाकिस्तानी मुस्लिम।

जिस महिला ने खुदकुशी की उसे हम तसनीम नाम से बुला लेते हैं। तसनीम का ब्याह एक इंजिनियर से हुआ जो, तसनीम के पिता की ही कंपनी में कार्यरत था। उसे तसनीम की पारिवारिक पार्श्व भूमी से अच्छे तरह वाबस्ता कराया गया। तसनीम के पिता की अच्छी जायदाद थी।

ब्याह के बाद लड़केने जिस भारतीय कंपनी में वो कार्यरत था( एक मशहूर टाटा कंपनी थी), वहाँ से नौकरी छोड़ दी और सउदी अरेबिया चला गया। कुछ माह वहाँ काम किया, और फिर अमेरिका चला आया। वहाँ उनकी एक बेटी का जनम हुआ। शादी के तुंरत बाद, तसनीम पे ये तोहमत लगना शुरू हो गयी,कि, वो तो ‘सही मायनेमे’ मुस्लिम हैही नही..माँ जो हिंदू परिवार से थी….!

तसनीम पे ज़बरदस्ती होने लगी,कि, वो दिन में पाँच बार नमाज़ पढ़े। केवल साडी पहने तथा, घरसे बाहर निकलते समय एक मोटी चद्दर ओढ़ के निकले। उसने येभी करना शुरू किया, लेकिन ताने देना, मानसिक छल और साथ ही साथ शारीरिक छल जरी रहा।

तसनीम अपने पिता के घर आयी तब उसने ये बातें अपने परिवार को बता दी। उसे समझा बुझा के वापस भेज दिया गया..ऐसा होता है..ठीक हो जाएगा..अदि,अदि..उसकी भाभी,( सुलताना), जिसकी अपनी माँ अँगरेज़ थी, घबरा गयी,कि, कहीँ ननद भारत में ही रहने आ गयी,तो मेहमानों वाले कमरेमे वो रहेगी…जब उसके पीहर वाले आएँगे तो उन्हें कहाँ रुकाया जाएगा?

सुलताना का रवैय्या अपनी ननद के प्रती बेहद कटु हो गया। ये सब मै क़रीब से देख रही थी…बलिक,सुलताना ने ये तक कह दिया,कि , गर, तसनीम उस घर में रहेगी तो वो अपने माँ-बाप के घर चली जायेगी!

तसनीम की माँ बेहद समझदार, सुलझी हुई महिला थी। उसने एक बार भी अपनी बहू को उलाहना नही दी…विडम्बना देखिये..सुलताना जिस घरमे रह रही थी, वो घर उसके ससुर का। उसकी ननद का मायका..गर एक लडकी, मानसिक तथा शारीरिक परेशानी में अपने माँ बाप के पास नही आयेगी तो कहाँ जायेगी? और ख़ुद सुलताना ने भी तो वही करनेकी घरवालों को धमकी देदी…! अपने ख़ुद के माँ-बाप के घर चले जानेकी…! तसनीम ने यहाँ तक कहा,कि, उसे अगर, उसी शहर में, दूसरा, घर ले दिया जाय तो वो वहाँ चली जायेगी। नौकरी कर लेगी…

इन सब हालातों के चलते, तसनीम ने एक और बच्चे को जन्म दे दिया। अबके पुत्र था। उसे परिवार यहीँ पे रोकना था,लेकिन, पतिदेव राज़ी नही हुए ! तसनीम पे अत्याचार जारी रहे..वो ४ बार भारत लौटी, लेकिन चारों बार उसपे दबाव डाला गया,और वापस भेज दिया गया..वो जब भारत भी आती,तो, मुंबई की तपती, उमस भरी गरमी में एक मोटी चद्दर लेके बाहर निकलती।

आख़री बार जब वो आयी तो, बच्चों को मुंबई की एक स्कूल में दाखिला दिलाया गया। बेटा तो मानो एक फ़रिश्ता था..उसकी माँ जब उसे स्कूल से लेने आती तो उसे चूम के कहता,” अम्मा तुम को मेरे लिए इतनी गरमी में आना पड़ता है,हैना? “

ये आँखों देखा क़िस्सा सुना रही हूँ। बच्चों के आगे खाने के लिए जो रखा जाता,चुपचाप खा लेते। लेकिन, भाभी को किसी भी तरह से ननद का उस घर में रहना बरदाश्त नही हो रहा था। तसनीम हर तरह से घरमे हाथ बटाती…अपने तथा अपने भाई के बच्चों को स्कूल से लाना ले जाना उसी के ज़िम्मे था। उसने ये तक कहा,कि, गर उसकी कहीँ और शादी कर सकते हैं,तो उसके लिए भी राज़ी हूँ…

इसपे भाभी ने कह दिया,” दो बच्चों की माँ के साथ कौन ब्याह करेगा”?

तसनीम डिप्रेशन में जाती रही। उसने ये भी सुझाया कि, उसे किसी मनो वैज्ञानिक के पास भेजा जाय तो ठीक रहेगा…लेकिन, ये सब, उस परिवार के बड़ों को ( माँ को तो था), मंज़ूर नही था। ख़ास कर, भाई भाभी को…लोग क्या कहेंगे? अलावा, पैसे खर्च होंगे…जबकि, पैसे तो तसनीम के पिता देते!

उसके बच्चों को कोई प्यार करता या तोह्फ़ा देता, पर साथ ही साथ, सुलताना के बच्चों को नही देता,तो घरमे कुहराम मच जाता..तसनीम इसी मे बेहतरी समझती, कि, तोह्फ़ा चुपचाप अपने भाई के बच्चों को पकड़ा दिया जाय..उसके अपने बच्चे इतने समझदार थे,कि, कभी चूँ तक नही करते…! तसनीम की मानसिक स्थिती की गंभीरता समझने को जैसे कोई तैयार ही ना था..

क्रमश:

अगली किश्त मे क़िस्सा पूरा कर दूँगी। विषय की गहराई मे गयी, ताकि, तसनीम को आत्म हत्या करने पे मजबूर करने वाले हालात सामने रख सकूँ..

अर्थी तो उठी…१)

चंद वाक़यात लिखने जा रही हूँ…जो नारी जीवन के एक दुःख भरे पहलू से ताल्लुक़ रखते हैं….ख़ास कर पिछली पीढी के, भारतीय नारी जीवन से रु-ब-रु करा सकते हैं….

हमारे मुल्क में ये प्रथा तो हैही,कि, ब्याह के बाद लडकी अपने माता-पिता का घर छोड़ ‘पती’के घर या ससुराल में रहने जाती है…बचपन से उसपे संस्कार किए जाते हैं,कि, अब वही घर उसका है, उसकी अर्थी वहीँ से उठनी चाहिए..क्या ‘वो घर ‘उसका’ होता है? क़ानूनन हो भी, लेकिन भावनात्मक तौरसे, उसे ऐसा महसूस होता है? एक कोमल मानवी मन के पौधेको उसकी ज़मीन से उखाड़ किसी अन्य आँगन में लगाया जाता है…और अपेक्षा रहती है,लडकी के घर में आते ही, उसे अपने पीहर में मिले संस्कार या तौर तरीक़े भुला देने चाहियें..! ऐसा मुमकिन हो सकता है?

जो लिखने जा रही हूँ, वो असली घटना है..एक संभ्रांत परिवार में पली बढ़ी लडकी का दुखद अंत…उसे आत्महत्या करनी पडी… वो तो अपने दोनों बच्चों समेत मर जाना चाह रही थी..लेकिन एक बच्ची, जो ५ सालकी या उससे भी कुछ कम, हाथसे फिसल गयी..और जब इस महिलाने १८ वी मंज़िल से छलाँग लगा ली,तो ये ‘बद नसीब’ बच गयी… हाँ, उस बचने को मै, उस बच्ची का दुर्भाग्य कहूँगी….

जिस हालमे उसकी ज़िंदगी कटती रही…शायद उन हालत से पाठक भी वाबस्ता हों, तो यही कह सकते हैं..
ये सब, क्यों कैसे हुआ…अगली किश्त में…
क्रमश:
२ किश्तें और होंगी…

कार्टून :- ये है लार टपकाऊ मंत्रालय

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